
High Court का बड़ा फैसला: बर्खास्त जेल प्रहरी की बहाली के निर्देश, जानिए मामला
रायपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य शासन द्वारा बर्खास्त किए गए जेल प्रहरी लखनलाल जायसवाल की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। जस्टिस पीपी साहू की एकल पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बिना किसी ठोस साक्ष्य और उचित वैधानिक प्रक्रिया के किसी कर्मचारी को सेवा से निकालना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है।
क्या था पूरा मामला?
जेल प्रहरी लखनलाल जायसवाल को 2 अगस्त 2024 को एक कैदी को चिकित्सा जांच के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर मेमोरियल अस्पताल (मेकाहारा), रायपुर ले जाने की जिम्मेदारी दी गई थी। उसी दौरान सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो प्रसारित हुए, जिनमें आरोप लगाया गया कि प्रहरी कैदी को लेकर अस्पताल के बजाय फाफडीह इलाके के एक रेस्तरां में घूम रहा था।
विभाग ने लगाए थे दो गंभीर आरोप
- अनाधिकृत भ्रमण: अस्पताल ले जाने के दौरान कैदी के परिजनों के साथ रेस्तरां में घूमना।
- जेल वापसी में देरी: बिना किसी वाजिब कारण के देर शाम जेल लौटना, जिससे कैदी के फरार होने का जोखिम पैदा हुआ।
इन आरोपों के आधार पर विभाग ने जांच के बाद 31 दिसंबर 2024 को लखनलाल को सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

हाईकोर्ट में अधिवक्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संदीप दुबे ने कोर्ट में दलील दी कि विभागीय जांच पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण थी। उन्होंने बताया कि वीडियो फुटेज को साक्ष्य अधिनियम के तहत प्रमाणित नहीं किया गया था। अस्पताल में जांच के दौरान देरी क्यों हुई, इसके लिए मेडिकल स्टाफ से कोई पूछताछ नहीं की गई। आरोप पत्र में समय और स्थान का स्पष्ट विवरण नहीं था।
कोर्ट की टिप्पणी: “टिकाऊ नहीं है बिना सबूत की सजा”
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि विभागीय जांच में ‘प्राकृतिक न्याय’ का पालन अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि राज्य शासन ने अस्पताल के दस्तावेजों या गवाहों की जांच किए बिना केवल सोशल मीडिया वीडियो के आधार पर इतनी बड़ी सजा दे दी। कोर्ट ने कहा कि जब प्रक्रिया में गंभीर खामियां हों, तो न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
बहाली के साथ ‘सेवा निरंतरता’ का लाभ
जस्टिस पीपी साहू ने 31 दिसंबर 2024 और 6 अगस्त 2025 के बर्खास्तगी आदेशों को निरस्त करते हुए लखनलाल जायसवाल को सेवा में वापस लेने का आदेश दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन्हें पिछला वेतन (Back Wages) नहीं मिलेगा, लेकिन उनकी सेवा की निरंतरता (Continuity of Service) बनी रहेगी, जिससे उनके भविष्य के लाभ प्रभावित नहीं होंगे।
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