
Supreme Court का महत्वपूर्ण फैसला: चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी को हिरासत में लेने की जरूरत नहीं
नई दिल्ली, 9 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने एक धोखाधड़ी के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि चार्जशीट दाखिल हो जाने के बाद आरोपी को हिरासत में लेने का कोई कारण नहीं होता। कोर्ट ने आरोपी व्यक्तियों को ट्रायल कोर्ट में पेश होने पर जमानत देने का निर्देश दिया है। यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के ताजगंज पुलिस स्टेशन में 9 जून 2025 को दर्ज एफआईआर संख्या 396/2025 से जुड़ा है। यह एक कॉर्पोरेट रिफंड विवाद से संबंधित धोखाधड़ी का मामला है। याचिकाकर्ता श्रीमती शालिनी भटेजा और एक अन्य व्यक्ति ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में एफआईआर रद्द करने की याचिका दायर की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और उन्हें 60 दिनों में ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जांच पूरी होने पर 11 सितंबर 2025 को चार्जशीट संख्या 144/2025 दाखिल की गई। केस का नाम: श्रीमती शालिनी भटेजा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 11375 ऑफ 2025, 2026 INSC 28)।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच और मुख्य टिप्पणी
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा, “चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, ऐसी परिस्थिति में ऐसा कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ताओं को हिरासत में लिया जाए।”
पीठ ने याचिकाकर्ताओं को एक महीने के अंदर संबंधित ट्रायल कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया। पेशी पर उसी दिन उन्हें जमानत दे दी जाएगी और आरोप तय किए जाएंगे। जमानत ट्रायल कोर्ट की संतोषजनक शर्तों पर होगी।
जमानत के लिए कोर्ट के दिशानिर्देश
याचिकाकर्ताओं को मामले के तेज निस्तारण में पूरा सहयोग करना होगा।
शिकायतकर्ता का प्रतिनिधित्व अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) कर सकता है।
IRP को गवाहों के रूप में पूर्व अधिकारियों या निदेशकों को बुलाने का अधिकार होगा।
कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि आरोपी को अनावश्यक हिरासत का सामना न करना पड़े।
इस फैसले का महत्व
यह फैसला उन मामलों में राहत देने वाला है जहां जांच पूरी हो चुकी हो और चार्जशीट दाखिल हो गई हो। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे दीवानी प्रकृति के विवादों को आपराधिक मामलों में बदलकर उत्पीड़न करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। आरोपी व्यक्तियों को लंबी हिरासत से बचाव मिलेगा और ट्रायल प्रक्रिया तेज होगी।
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