
Supreme Court: आरोपी के पापों का भार उसके परिवार पर नहीं डाला जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने दिया अहम तर्क — “परिजन दोषी हैं यह नहीं माना जा सकता”
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक हालिया आदेश में स्पष्ट किया है कि एक आरोपी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराधों के “पापों” का बोझ उसके परिवार के सदस्यों पर नहीं डाला जा सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी 731.075 किलोग्राम गांजा वंशाधिकार मामले में की, जहां आरोपी पर लगभग ₹ 2.91 करोड़ मूल्य का मादक पदार्थ रखने का आरोप था।

मामला और कोर्ट की प्रतिक्रिया
मामला यूनीयन ऑफ इंडिया बनाम नामदेव अशरूबा नकड़े है, जिसमें उच्चतम न्यायालय की पीठ (न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया) ने हाई कोर्ट द्वारा आरोपी को प्रदान की गई जमानत रद्द कर दी।
जमानत देने के प्रस्ताव के समय, आरोपी के भाई (जो भारतीय सेना में सेपॉय हैं) ने यह दावा किया कि वे एक अंडरटेकिंग दे सकते हैं ताकि आरोपी फरार न हो जाए। हालांकि, कोर्ट ने इस दावे को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “अगर उत्तरदाता (अभियुक्त) भाग भी जाये, तो उसके भाई को जेल में नहीं भेजा जा सकता। भारत में, आरोपी के कथित पाप उसके भाई या अन्य परिवार के सदस्यों पर थोपे नहीं जा सकते।”
NDPS एक्ट और गिरफ्तारी की लंबी अवधि
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत आरोपी का नहीं है — आरोपों में संगठित तस्करी का संकेत मिलता है, क्योंकि ट्रेलर के नीचे छिपी खुरदुरी झरोखों (concealed cavities) का उपयोग किया गया था।
ऐसी स्थिति में, एक साल और चार महीने की हिरासत को “अनुचित रूप से लंबी” नहीं माना जा सकता, क्योंकि NDPS कानून के तहत न्यूनतम सजा की संभावना बहुत अधिक है।
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