
Railway में पुराने और नए इंजीनियरों के बीच प्रमोशन और वेतन भेदभाव को लेकर विवाद
भारत। भारतीय रेलवे में ग्रेजुएट और डिप्लोमा इंजीनियरों के बीच प्रमोशन एवं वेतनमान को लेकर तल्खी बढ़ती जा रही है। खासतौर पर पुराने इंजीनियर वेतनमान के मामले में नए इंजीनियरों से काफी पीछे रह जाते हैं, जिससे कर्मचारी वर्ग में असंतोष फैल गया है।

प्रमोशन नीति में वित्तीय भेदभाव
रेलवे के डिजाइन और ड्रॉइंग कैडर में तैनात सीधे भर्ती ग्रेजुएट इंजीनियरों का आरोप है कि Modified Assured Career Progression Scheme (MACPS) में उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। नई प्रमोशन नीति के तहत अगर किसी कर्मचारी को 10, 20 या 30 साल तक प्रमोशन नहीं मिलता है तो उसे वित्तीय अपग्रेडेशन तो मिलेगा, पर वेतनमान की शुरुआत ही अलग-अलग ग्रेड पे पर हो रही है।
वेतनमान में बड़ी दूरी: 9000 बनाम 10500 रुपये
- 1998 से पहले भर्ती हुए ग्रेजुएट इंजीनियरों की शुरुआती ग्रेड पे लगभग 4200 रुपये (वेतनमान 5500-9000 रुपये) थी।
- वहीं, 1998 के बाद भर्ती इंजीनियरों की शुरुआत ग्रेड पे 4600 रुपये (वेतनमान 6500-10500 रुपये) से हो रही है।
- इससे पुराने इंजीनियरों को MACPS योजना के तहत उतना लाभ नहीं मिल रहा जितना नए इंजीनियरों को मिल पा रहा है।
- IRTSA की मांग है कि सभी सीधे भर्ती ग्रेजुएट इंजीनियरों के लिए एंट्री ग्रेड को समान रूप से ग्रेड पे 4600 रुपये/पे लेवल-7 निर्धारित किया जाए, ताकि वेतनमान में बराबरी हो सके।

उदाहरण से भेदभाव की स्पष्ट तस्वीर
- IRTSA ने आईसीएफ चेन्नई के मामले को उदाहरण के तौर पर रखा है:
- 1990 में भर्ती हुआ इंजीनियर तीन MACPS प्रमोशन पाने के बावजूद केवल लेवल-9 तक पहुंच पाया।
- जबकि 2004 में भर्ती नया ग्रेजुएट इंजीनियर लेवल-10 तक पहुंच चुका है।
- बेसिक सैलरी लेवल-10 में 56100 से 1,77,500 रुपये मासिक होती है, जो पुराने इंजीनियरों की तुलना में काफी अधिक है।
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