
लड़कियों का खतना POCSO ऐक्ट का उल्लंघन? Supreme Court ने केंद्र को जारी कर दिया नोटिस
याचिकाकर्ता का दावा—FGM है अमानवीय और असंवैधानिक प्रथा
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दलील दी कि खतना एक बेहद दर्दनाक और अमानवीय प्रक्रिया है, जो लड़कियों के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालती है। उनका कहना है कि यह प्रथा बच्चों के खिलाफ हिंसा की श्रेणी में आती है और इसका कोई चिकित्सा या धार्मिक औचित्य नहीं है।
केंद्र से मांगा जवाब—कानूनी स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश
पीठ ने केंद्र सरकार से सवाल पूछा है कि क्या वर्तमान कानूनों, विशेषकर POCSO ऐक्ट, IPC की धाराओं और जुवेनाइल जस्टिस कानून के तहत लड़कियों के खतना को अपराध की श्रेणी में रखा गया है या नहीं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार को ठोस रुख अपनाना होगा।

समुदाय विशेष की दलील—परंपरा का हिस्सा, हिंसा नहीं
कुछ समुदायों ने इस प्रथा को अपनी सदियों पुरानी परंपरा बताते हुए कहा है कि यह धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है और किसी प्रकार की हिंसा या हानि पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं किया जाता। हालांकि, विशेषज्ञों और बाल अधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसी दलीलें बच्चे के अधिकारों को प्रभावित नहीं कर सकतीं।
अगली सुनवाई में तय होंगी आगे की कानूनी दिशाएँ
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख तय की है, जिसमें केंद्र का जवाब और बाल अधिकार से जुड़े संगठनों के तर्कों के आधार पर आगे की कानूनी दिशा निर्धारित की जाएगी। यह मामला देश में FGM पर स्पष्ट कानून बनाने या इसे अपराध घोषित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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