
कवर्धा रियासत की 1751 से चली आ रही दशहरा परंपरा: आज भी राजपरिवार निभा रहा है विरासत, जानें इतिहास और महत्व
छत्तीसगढ़ का कवर्धा न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां की राजसी दशहरा परंपरा भी पूरे प्रदेश में अलग महत्व रखती है। साल 1751 में कवर्धा रियासत के राजाओं द्वारा प्रारम्भ की गई यह परंपरा आज भी राजपरिवार द्वारा निभाई जा रही है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कवर्धा रियासत की स्थापना 18वीं शताब्दी में हुई थी। तत्कालीन राजा ने दशहरा पर्व को राजपरिवार और प्रजा के बीच एकता और धार्मिक आस्था का उत्सव बनाने का संकल्प लिया।
1751 में पहली बार यहां राजमहल परिसर में भव्य रूप से दशहरा मनाया गया।
तब से लेकर आज तक यह परंपरा लगातार 270 से अधिक वर्षों से जीवित है।
परंपरा और आयोजन
दशहरा के दिन राजपरिवार द्वारा शाही जुलूस निकाला जाता है।
इस जुलूस में रथ, घोड़े, बग्घी और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ देवी दुर्गा की शोभायात्रा निकाली जाती है।
राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक परिधान पहनकर कार्यक्रम में सम्मिलित होते हैं।
राजमहल प्रांगण में आज भी राजा द्वारा शस्त्र पूजन और विजयादशमी की विधिवत रस्में निभाई जाती हैं।

सांस्कृतिक महत्व
कवर्धा की यह दशहरा परंपरा राजसी संस्कृति और लोक आस्था का संगम मानी जाती है।
यहां का उत्सव न केवल धार्मिक भावना से जुड़ा है बल्कि यह सामाजिक एकजुटता और ऐतिहासिक विरासत का भी प्रतीक है।
स्थानीय लोग मानते हैं कि यह आयोजन अच्छाई की जीत और शक्ति की साधना का प्रतीक है।
वर्तमान समय में
आज भी कवर्धा राजपरिवार इस परंपरा को उतनी ही श्रद्धा और गरिमा के साथ निभा रहा है।
हजारों लोग इस अवसर पर राजमहल परिसर और शहर की सड़कों पर उमड़ पड़ते हैं।
👉 हमारे WhatsApp channel से जुड़ने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें👇👇
https://whatsapp.com/channel/0029VbALQC677qVNwdR5Le3V



