
Kashi में ही क्यों मनाई जाती है देव दीपावली
वाराणसी। कार्तिक पूर्णिमा के दिन काशी में मनाई जाने वाली देव दीपावली का विशेष धार्मिक महत्व है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, जिसके बाद देवताओं ने दिव्य दीप जलाकर इस विजय का उत्सव मनाया। तभी से यह पर्व देव दीपावली के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

त्रिपुरासुर का वध और ‘त्रिपुरारी’ नाम की उत्पत्ति
पौराणिक कथा के अनुसार, त्रिपुरासुर नाम के तीन असुर भाइयों ने तपस्या कर तीन नगरों—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में अपना साम्राज्य स्थापित किया था। इन तीनों नगरों को मिलाकर “त्रिपुर” कहा गया। जब उनके अत्याचार बढ़े, तब देवताओं ने भगवान शिव से सहायता मांगी।
भगवान शिव ने अपने धनुष से एक ही बाण में उन तीनों नगरों का नाश कर दिया। इस घटना के बाद भगवान शिव को “त्रिपुरारी” कहा जाने लगा। इसी दिन देवताओं ने प्रसन्न होकर दीप जलाए और आनंद मनाया, जिसे देव दीपावली कहा जाता है।

गंगा तट पर जगमगाते दीपों से सजे घाट
काशी के सभी घाटों पर इस दिन दीपों की जगमगाहट देखते ही बनती है। दशाश्वमेध, अस्सी, पंचगंगा और राजघाट जैसे प्रमुख घाटों पर लाखों दीप जलाए जाते हैं। श्रद्धालु गंगा स्नान कर भगवान शिव और गंगा माता की पूजा करते हैं। पूरा शहर मानो स्वर्गलोक जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है।
देव दीपावली का आध्यात्मिक संदेश
यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय और अहंकार पर विनम्रता की जीत का प्रतीक है। जैसे भगवान शिव ने असुरों का नाश कर धर्म की स्थापना की, वैसे ही देव दीपावली हमें सिखाती है कि ज्ञान का दीप जलाकर हमें भीतर और बाहर के अंधकार को मिटाना चाहिए।
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