
जेएनयू छात्र नजीब अहमद की गुमशुदगी: सीबीआई ने केस बंद किया, मां फातिमा नफीस की उम्मीद अब भी बरकरार
नई दिल्ली, 8 जुलाई 2025
मामला और कोर्ट का फैसला
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र नजीब अहमद की गुमशुदगी के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने अपनी जांच को औपचारिक रूप से बंद कर दिया है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सोमवार को सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, जिसमें कहा गया कि नौ साल की व्यापक जांच के बावजूद नजीब का कोई सुराग नहीं मिला। हालांकि, नजीब की मां फातिमा नफीस ने हार नहीं मानी और कहा, “मैं अपनी आखिरी सांस तक अपने बेटे के लिए न्याय की लड़ाई लड़ूंगी।”
नजीब की गुमशुदगी का पृष्ठभूमि
27 वर्षीय नजीब अहमद, जो जेएनयू में एमएससी बायोटेक्नोलॉजी के प्रथम वर्ष के छात्र थे, 15 अक्टूबर 2016 को विश्वविद्यालय के माही-मांडवी हॉस्टल से रहस्यमय तरीके से लापता हो गए थे। उनकी गुमशुदगी से एक रात पहले कथित तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कुछ सदस्यों के साथ उनकी झड़प हुई थी। इस घटना ने न केवल जेएनयू बल्कि पूरे देश में वैचारिक हिंसा और असहिष्णुता पर बहस को जन्म दिया था।
सीबीआई की जांच और कोर्ट का निर्णय

सीबीआई ने 2018 में जांच बंद करने का फैसला किया था, क्योंकि उनके सभी प्रयास नजीब का पता लगाने में असफल रहे। दिल्ली हाईकोर्ट की अनुमति के बाद, एजेंसी ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल की, जिसे अब स्वीकार कर लिया गया है। कोर्ट ने कहा कि सीबीआई ने सभी संभावित पहलुओं की जांच की, लेकिन कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी ने उम्मीद जताई कि भविष्य में नजीब का पता लग सकता है, लेकिन फिलहाल केस को बंद करने की अनुमति दे दी गई।
मां फातिमा नफीस का संघर्ष
फातिमा नफीस ने सीबीआई और दिल्ली पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा, “पहले दिन से ही जांच एजेंसियों ने लापरवाही बरती। जिन लोगों ने मेरे बेटे के साथ मारपीट की, उन्हें न तो गिरफ्तार किया गया और न ही कोई कार्रवाई हुई।” फातिमा ने अपनी लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की बात कही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “मेरे नजीब को गायब हुए नौ साल हो गए, लेकिन मैं उम्मीद कैसे छोड़ दूं? वो मेरा बेटा है।”

छात्रों का विरोध और सामाजिक प्रभाव
नजीब की गुमशुदगी ने जेएनयू में व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए थे। छात्र संगठनों, विशेष रूप से वामपंथी समूहों और जेएनयू छात्रसंघ ने इस मामले को उठाया और इसे शैक्षणिक संस्थानों में बढ़ती असहिष्णुता का प्रतीक बताया। फातिमा ने कहा कि जेएनयू, एएमयू, जामिया और देशभर के छात्रों ने उनके संघर्ष में साथ दिया।
राजनीतिक और सामाजिक बहस
इस मामले ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को भी जन्म दिया। कुछ लोगों का मानना है कि नजीब की गुमशुदगी के पीछे वैचारिक टकराव है, जबकि अन्य इसे एक अनसुलझी पहेली मानते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नजीब के लापता होने और हॉस्टल में हुई झड़प के बीच कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ।

फातिमा की अपील और भविष्य की उम्मीद
फातिमा नफीस ने अपील की कि लोग उनके साथ इस न्याय की लड़ाई में जुड़ें। उन्होंने कहा, “मैं अकेले नहीं लड़ रही, मेरे साथ देश का हर वो इंसान है जो सच और इंसाफ के लिए खड़ा है।” इस बीच, जेएनयू छात्रसंघ ने कोर्ट के फैसले को “न्याय से इनकार” करार दिया और दिल्ली पुलिस की शुरुआती जांच की आलोचना की।
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