
जांच एजेंसियों को समयसीमा तय करने में अदालतें बरतें संयम : Supreme Court
अनावश्यक हस्तक्षेप से जांच की स्वतंत्रता प्रभावित होती है
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतों को जांच एजेंसियों के लिए जांच पूरी करने की समयसीमा सामान्य तौर पर तय नहीं करनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल उन्हीं मामलों में समयसीमा निर्धारित की जानी चाहिए, जहां जांच में अनुचित या अत्यधिक देरी पाई जाए।

जांच एजेंसियों को मिलनी चाहिए स्वतंत्रता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी जांच एजेंसी को स्वतंत्र रूप से जांच करने का अधिकार दिया जाना चाहिए। बिना ठोस कारण के समयसीमा तय करना, एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में दखल देने जैसा है। अदालत ने इसे जांच एजेंसियों के “पैरों पर पैर रखने” के समान बताया।
देरी होने पर ही हो न्यायिक हस्तक्षेप
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि यदि यह स्पष्ट हो जाए कि जांच जानबूझकर लटकाई जा रही है या अनावश्यक देरी हो रही है, तभी अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं और समयसीमा निर्धारित कर सकती हैं। इससे न्याय और निष्पक्ष जांच—दोनों के बीच संतुलन बना रहेगा।
न्यायिक संतुलन बनाए रखने पर जोर
इस फैसले को न्यायपालिका और जांच एजेंसियों के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में अहम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में लंबित जांचों और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को स्पष्ट करने में मार्गदर्शक साबित हो सकती है।
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