
High Court का बड़ा फैसला: अस्थायी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर सजा नहीं, तीन ग्रामीण बरी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरिया जिले के तीन ग्रामीणों को बड़ी राहत देते हुए एट्रोसिटी एक्ट के तहत ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा पेश किया गया जाति प्रमाणपत्र अस्थायी था, जिसकी वैधता 6 माह थी और इस आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
शिकायतकर्ता स्थायी जाति प्रमाणपत्र पेश करने में विफल
हाईकोर्ट द्वारा रेकॉर्ड की गई जांच में यह स्पष्ट हुआ कि पीड़ित छोटेलाल ट्रायल कोर्ट में कोई भी मान्य और स्थायी जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं कर पाया। उसके द्वारा दिए गए सभी दस्तावेज अस्थायी थे और उनकी वैधता अवधि भी समाप्त हो चुकी थी।

वैध जाति प्रमाण अनिवार्य: हाईकोर्ट
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एट्रोसिटी एक्ट के तहत दोष सिद्ध करने के लिए वैध जाति प्रमाणपत्र आवश्यक होता है। चूंकि इस मामले में शिकायतकर्ता के पास वैध प्रमाण मौजूद नहीं था, इसलिए यह माना नहीं जा सकता कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा कानूनी रूप से उचित थी।
सोनहत थाना क्षेत्र का मामला
यह पूरा मामला कोरिया जिले के सोनहत थाना क्षेत्र से संबंधित है, जहां जाति सूचक गाली–गलौज के आरोप में तीन ग्रामीणों को ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था। लेकिन हाईकोर्ट ने सभी तथ्य और दस्तावेजों की जांच के बाद ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए ग्रामीणों को बरी कर दिया।
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