
“पुलिस हमारा बाप है” के नारे लगवाने पर भड़का High Court, DGP को सख्त निर्देश, कहा – मर्यादा में रहकर करें कार्रवाई
बिलासपुर/भिलाई | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पुलिसिया ज्यादती और अधिकारों के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि नागरिकों की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि किसी भी गिरफ्तारी या रिमांड के दौरान कानून के दायरे में रहकर ही काम करें।
क्या था मामला?
यह पूरा मामला भिलाई (दुर्ग) के स्मृति नगर चौकी इलाके का है। अक्टूबर 2025 में एक सिनेमा हॉल के भीतर मामूली कहासुनी हुई थी, जिसके बाद पुलिस ने पांच स्थानीय निवासियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। याचिकाकर्ताओं (सुजीत साव व अन्य) ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके साथ न केवल मारपीट की, बल्कि उन्हें हथकड़ी लगाकर सार्वजनिक रूप से घुमाया।
कोर्ट को बताया गया कि पुलिस ने उन्हें सार्वजनिक रूप से “अपराध करना पाप है, पुलिस हमारा बाप है” जैसे नारे लगाने के लिए मजबूर किया। याचिका में कहा गया कि पुलिस ने अपनी खुन्नस निकालने के लिए मामूली विवाद को बड़ा रूप दिया और जबरन अतिरिक्त धाराएं जोड़ दीं।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी और DGP को निर्देश
हाईकोर्ट ने इस व्यवहार को “पूरी तरह से अस्वीकार्य” बताया। कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का काम है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे किसी का मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न करें।

हाईकोर्ट का आदेश
राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) सभी थानों को स्थायी निर्देश जारी करें कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। संबंधित थाना प्रभारी (SHO) के आचरण की जांच करने और उन पर उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस यह सुनिश्चित करे कि सार्वजनिक परेड, अनावश्यक हथकड़ी या मानसिक प्रताड़ना जैसे कृत्य न किए जाएं।
सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से महाधिवक्ता ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस ने एक महिला की शिकायत पर कार्रवाई की थी। पुलिस ने तर्क दिया कि गाड़ी खराब होने की वजह से आरोपियों को पैदल चलना पड़ा था, जिसे सार्वजनिक परेड का नाम दिया जा रहा है। हालांकि, कोर्ट इन तर्कों से संतुष्ट नजर नहीं आया।
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