February 1, 2026
एक ही साज़िश से बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के मामलों में एक FIR दर्ज करना कानूनी तौर पर सही: Supreme Court

एक ही साज़िश से बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के मामलों में एक FIR दर्ज करना कानूनी तौर पर सही: Supreme Court

Jan 7, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जहां एक ही आपराधिक साजिश से बड़ी संख्या में लोगों के साथ धोखाधड़ी की जाती है, वहां एक ही FIR दर्ज करना और अन्य शिकायतों को CrPC की धारा 161 के तहत बयान के रूप में मानना पूरी तरह कानूनी है। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हर पीड़ित के लिए अलग-अलग FIR दर्ज करने का आदेश दिया गया था। यह फैसला बड़े पैमाने पर निवेश धोखाधड़ी के मामलों में जांच प्रक्रिया को सरल बनाएगा।

मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा में 2009 में दर्ज FIR नंबर 89 से जुड़ा है। आरोप था कि अशोक जडेजा और उनके साथी खिमजी भाई जडेजा सहित अन्य ने निवेशकों से पैसे तीन गुना करने का झूठा वादा करके धोखाधड़ी की। जांच में पता चला कि एक ही साजिश के तहत 1,852 निवेशकों से करीब 46.40 करोड़ रुपये की ठगी की गई।

दिल्ली पुलिस ने केवल एक FIR दर्ज की और अन्य 1,851 शिकायतों को CrPC धारा 161 के तहत बयान मान लिया। ट्रायल कोर्ट ने इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट से राय मांगी, जहां हाईकोर्ट ने कहा कि हर लेन-देन अलग होने से अलग-अलग FIR दर्ज करनी चाहिए और अलग चार्जशीट दाखिल करनी होगी।

दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने दिल्ली NCT की अपील पर सुनवाई की। कोर्ट ने हाईकोर्ट के जवाबों को गलत ठहराया और कहा कि जांच के शुरुआती चरण में अलग-अलग FIR अनिवार्य करना गलत है। पीठ ने स्पष्ट किया कि अपराध “एक ही लेन-देन” का हिस्सा हैं या नहीं, यह जांच के बाद ही तय हो सकता है।
कोर्ट ने “एक ही लेन-देन” तय करने के लिए तीन मानदंड दोहराए: अपराध का मकसद और डिजाइन एक होना, समय और स्थान की निकटता, तथा कार्यों में निरंतरता। हालांकि, इन सभी को एक साथ लागू करना जरूरी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां
पीठ ने कहा: “चूंकि साजिश का आरोप है, जिससे अलग-अलग लोगों के साथ धोखाधड़ी के कई कार्य हुए, इसलिए दिल्ली पुलिस द्वारा एक FIR दर्ज करके और अन्य शिकायतकर्ताओं की शिकायतों को CrPC धारा 161 के तहत बयान मानने का तरीका उस चरण पर अपनाया जाने वाला सही तरीका था।”

कोर्ट ने जोर दिया कि आरोपों को जोड़ने या अलग करने का फैसला चार्ज तय करने के चरण में ट्रायल कोर्ट CrPC धारा 219 के तहत लेगा, न कि जांच के शुरुआती दौर में। सजा की चिंताओं (जैसे IPC धारा 71 या CrPC धारा 31 के तहत) का FIR दर्ज करने पर कोई असर नहीं पड़ता।

 

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