March 2, 2026
दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार के दोषी की सजा 30 से घटाकर 20 साल की

दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार के दोषी की सजा 30 से घटाकर 20 साल की

Jul 15, 2025

नई दिल्ली, 15 जुलाई 2025:

दिल्ली उच्च न्यायालय ने 12 साल की नाबालिग लड़की से बलात्कार के दोषी एक व्यक्ति की सजा को 30 साल से घटाकर 20 साल कर दिया है। यह फैसला जेल में दोषी के अच्छे आचरण को ध्यान में रखते हुए लिया गया।

जेल में अच्छे आचरण का आधार

न्यायमूर्ति अमित शर्मा ने 11 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि दोषी 6 अप्रैल, 2015 से हिरासत में है और उसने जेल में संतोषजनक रिकॉर्ड बनाए रखा। उसने जेल में सफाई सहायक के रूप में काम किया, जिसे अदालत ने सजा में कमी का आधार माना।

निचली अदालत का फैसला और अपील

निचली अदालत ने दोषी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376(2)(i) और (n) के तहत 30 साल की सजा सुनाई थी, यह कहते हुए कि अपराध की प्रकृति जघन्य है। दोषी ने 2013 के इस फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील की थी। अदालत ने अपराध की गंभीरता को स्वीकार करते हुए सजा में आंशिक कमी की अनुमति दी।

अपराध का विवरण

घटना 2014 की है, जब दोषी ने अपने पड़ोस में रहने वाली 12 साल की नाबालिग लड़की के साथ बार-बार बलात्कार किया। पीड़िता ने पुलिस को बताया कि दिसंबर 2014 में, जब वह घर पर अकेली थी, आरोपी ने उसके घर में घुसकर उसका यौन उत्पीड़न किया। उसने अश्लील तस्वीरें दिखाईं, थप्पड़ मारा और धमकी दी कि अगर उसने किसी को बताया तो गंभीर परिणाम भुगतेंगे।

मेडिकल जाँच और गर्भावस्था

जब पीड़िता को पेट दर्द की शिकायत हुई, तो उसकी माँ उसे डॉक्टर के पास ले गई। मेडिकल जाँच में पता चला कि वह गर्भवती थी, जिसके बाद डॉक्टरों ने गर्भपात की सलाह दी। डीएनए नमूने एकत्र किए गए और फोरेंसिक जाँच में दोषी की संलिप्तता की पुष्टि हुई।

कानूनी कार्रवाई और सजा

जाँच के बाद, दोषी को आईपीसी की धारा 376(2)(i) और (n) (नाबालिग से बार-बार बलात्कार), धारा 450 (घर में जबरन घुसना), और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत दोषी ठहराया गया। इसके अलावा, उसे यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत भी सजा सुनाई गई। हालाँकि, यौन उत्पीड़न के आरोप से उसे बरी कर दिया गया।

अदालत का नजरिया

हाईकोर्ट ने माना कि अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन जेल में दोषी के सुधारात्मक व्यवहार को देखते हुए सजा में कमी उचित है। यह फैसला नाबालिगों के खिलाफ अपराधों के प्रति कठोर रुख और सुधारात्मक न्याय के बीच संतुलन को दर्शाता है।

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