
छत्तीसगढ़ High Court का ऐतिहासिक फैसला: कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता अतिरिक्त वेतन वसूली का बोझ
बिलासपुर, 4 सितंबर 2025: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तकनीकी शिक्षा निदेशालय के एक आदेश को खारिज करते हुए एक कर्मचारी को बड़ी राहत प्रदान की है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि विभागीय गलती के कारण किसी कर्मचारी को अतिरिक्त वेतन का भुगतान किया गया है, तो उसका बोझ कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता। यह फैसला न केवल याचिकाकर्ता के लिए, बल्कि उन सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जो ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं।

मामले का विवरण
मामला जांजगीर-चांपा के शासकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के प्राचार्य गोपाल प्रसाद नायक से संबंधित है। नायक की नियुक्ति 1996 में तकनीकी शिक्षा विभाग में व्याख्याता के रूप में हुई थी। समय के साथ उनकी पदोन्नति हुई और वे प्राचार्य के पद तक पहुंचे। उनके वेतन का निर्धारण विभागीय अधिकारियों द्वारा किया गया था, और इस प्रक्रिया में उनकी कोई व्यक्तिगत भूमिका नहीं थी।
हालांकि, तकनीकी शिक्षा निदेशालय, नया रायपुर ने 21 दिसंबर 2022 को एक आदेश जारी किया, जिसमें दावा किया गया कि नायक को 2006 से अधिक वेतन का भुगतान किया गया था। इस आधार पर, विभाग ने उनके वेतन से वसूली शुरू करने का निर्णय लिया। यह आदेश नायक के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि वेतन निर्धारण में उनकी कोई गलती नहीं थी और यह पूरी तरह से विभागीय अधिकारियों की प्रक्रिया पर आधारित था।
हाईकोर्ट में याचिका
गोपाल प्रसाद नायक ने इस आदेश के खिलाफ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में उनके वकील मतीन सिद्दीकी और दीक्षा गौराहा ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि अतिरिक्त वेतन का भुगतान कर्मचारी की धोखाधड़ी, गलत सूचना या गलती के कारण नहीं हुआ है, तो उससे वसूली नहीं की जा सकती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले स्टेट ऑफ पंजाब बनाम रफीक मसीह (2015) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि ऐसी परिस्थितियों में कर्मचारी को दंडित करना अनुचित है।
इसके अलावा, वकीलों ने थॉमस डेनियल (2022) और जोगेश्वर साहू (2023) जैसे अन्य मामलों का भी उल्लेख किया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने इसी सिद्धांत की पुष्टि की थी। उन्होंने तर्क दिया कि नायक को 16 वर्षों तक वही वेतन मिलता रहा, जो विभाग द्वारा निर्धारित किया गया था, और अब इतने लंबे समय बाद वसूली का आदेश देना न केवल अनुचित है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता है।

हाईकोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि वेतन का निर्धारण विभागीय अधिकारियों द्वारा किया गया है और इसमें कर्मचारी की कोई गलती, धोखाधड़ी या गलत सूचना शामिल नहीं है, तो इतने लंबे समय बाद वसूली का आदेश देना “पूरी तरह अनुचित और अन्यायपूर्ण” है। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि नायक को 1996 से लेकर उनकी पदोन्नति तक वेतन का भुगतान विभागीय आदेशों के आधार पर किया गया था, और इन आदेशों में किसी भी प्रकार की त्रुटि या भविष्य में वसूली की संभावना का उल्लेख नहीं था।
न्यायमूर्ति प्रसाद ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह मामले के सिद्धांत को दोहराया, जिसमें कहा गया था कि कर्मचारी को ऐसी गलतियों का खामियाजा नहीं भुगतना चाहिए, जो पूरी तरह से नियोक्ता की ओर से हुई हों। कोर्ट ने तकनीकी शिक्षा निदेशालय के 21 दिसंबर 2022 के आदेश को रद्द कर दिया और नायक को राहत प्रदान की।
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