
महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या: एक गहराता संकट
11 जुलाई , 25
छह महीने में 257 किसानों ने दी जान
महाराष्ट्र के अमरावती संभाग में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, बीते छह महीनों में 257 किसानों ने आत्महत्या की है। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि राज्य में कृषि संकट कितना गहरा चुका है।
कर्ज, प्राकृतिक आपदा और नीतिगत उपेक्षा
किसानों की आत्महत्या के पीछे कई कारण हैं, जिनमें बढ़ता कर्ज, अनियमित बारिश, फसलों की बर्बादी और इलाज जैसे खर्च शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की नीतिगत उपेक्षा और समय पर सहायता न मिलने के कारण किसान हताशा में यह कठोर कदम उठा रहे हैं। एक किसान की पत्नी, माया वानखेड़े ने कहा, “सरकार कर्जमाफी की बात तो करती है, लेकिन हकीकत में कोई मदद नहीं मिलती।”
मराठवाड़ा और विदर्भ सबसे ज्यादा प्रभावित
मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों में आत्महत्या की दर सबसे अधिक है। राजस्व विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में मराठवाड़ा के आठ जिलों में 520 किसानों ने आत्महत्या की, जो पिछले साल की तुलना में 20% अधिक है। बीड जिले में सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए, जहां 126 किसानों ने अपनी जान गंवाई।
सरकार की प्रतिक्रिया और विपक्ष का हमला
महाराष्ट्र सरकार ने आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को 1 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया है, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि यह सहायता समय पर नहीं पहुंच रही। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने सरकार पर किसानों की अनदेखी का आरोप लगाया है। दूसरी ओर, बीजेपी ने कांग्रेस-एनसीपी के पिछले शासनकाल में हुई 55,928 आत्महत्याओं का हवाला देकर पलटवार किया है।
क्या हैं समाधान?
किसानों की आत्महत्या को रोकने के लिए विशेषज्ञ दीर्घकालिक उपायों की मांग कर रहे हैं। इसमें कर्जमाफी, फसल बीमा योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन, और मानसिक स्वास्थ्य के लिए परामर्श केंद्रों की स्थापना शामिल है। सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं, जैसे जिला स्तर पर परामर्श केंद्र स्थापित करना, लेकिन इनके प्रभाव को लेकर सवाल बने हुए हैं।
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