
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का सख्त रुख: अनुकंपा नियुक्ति में लापरवाही पर DIGP और जांजगीर SP को नोटिस
रायपुर, 26 जुलाई 2025:
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के एक मामले में कोर्ट के आदेशों का पालन न करने पर डीआईजीपी (प्रशासन) पारूल माथुर और जांजगीर-चांपा के पुलिस अधीक्षक विजय पांडे को अवमानना नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने दोनों अधिकारियों से इस गंभीर मामले में जवाब तलब किया है। यह मामला पामगढ़ के वार्ड क्रमांक 16 के निवासी विक्की भारती से जुड़ा है, जिन्हें उनके पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति दी जानी थी।
अनुकंपा नियुक्ति में देरी का मामला
विक्की भारती के पिता को उनकी मृत्यु से पहले अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी, जिसे बाद में छत्तीसगढ़ सरकार के गृह विभाग ने निरस्त कर दिया था। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने विक्की को अनुकंपा नियुक्ति का हकदार माना और पुलिस विभाग को 90 दिनों के भीतर उनकी नियुक्ति करने का आदेश दिया था। हालांकि, निर्धारित समयसीमा बीत जाने के बाद भी विक्की को नौकरी नहीं दी गई, जिसके चलते उन्होंने अपने अधिवक्ताओं अभिषेक पांडे और प्रिया अग्रवाल के माध्यम से हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की।
कोर्ट के आदेशों की अनदेखी पर सवाल
अधिवक्ताओं ने कोर्ट में तर्क दिया कि राज्य के कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हाईकोर्ट के आदेशों का समय पर पालन नहीं कर रहे, जिससे न्यायालय की अवमानना हो रही है। इससे अवमानना याचिकाओं की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। जुलाई 2025 तक हाईकोर्ट में 1,149 अवमानना याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं, जो एक चिंताजनक स्थिति है। अधिवक्ताओं ने बताया कि इस तरह की लापरवाही से कोर्ट का कीमती समय बर्बाद हो रहा है और न्याय प्रक्रिया बाधित हो रही है।
अवमानना अधिनियम के तहत सजा का प्रावधान
याचिका में अधिवक्ताओं ने अवमानना अधिनियम की धारा 12 का हवाला देते हुए कहा कि दोषी पाए जाने पर छह महीने की जेल, दो हजार रुपये जुर्माना या दोनों सजा का प्रावधान है। उन्होंने मांग की कि डीआईजीपी पारूल माथुर और एसपी विजय पांडे के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में कोर्ट के आदेशों का सम्मान सुनिश्चित हो।
हाईकोर्ट का त्वरित एक्शन
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस याचिका को गंभीरता से लेते हुए डीआईजीपी पारूल माथुर और एसपी विजय पांडे को तत्काल नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने दोनों अधिकारियों को इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि कोर्ट के आदेशों के प्रति गंभीरता की कमी को भी दर्शाता है।
भविष्य में सख्ती की चेतावनी
इस मामले ने एक बार फिर प्रशासनिक अधिकारियों के लिए कोर्ट के आदेशों का पालन करने की महत्ता को रेखांकित किया है। हाईकोर्ट का यह कदम यह सुनिश्चित करने की दिशा में है कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही न दोहराई जाए और न्याय प्रणाली के प्रति सम्मान बना रहे। इस मामले में कोर्ट का अंतिम निर्णय आने वाले समय में स्थिति को और स्पष्ट करेगा।
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