
झूठे आरोप और सबूतों के अभाव में तलाक नहीं: High Court का महत्वपूर्ण फैसला
पति की अपील खारिज, फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के विवाद और तलाक से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजय कुमार जायसवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस सबूतों के वैवाहिक क्रूरता साबित नहीं होती। साथ ही यदि कोई घटना हुई भी हो और पति ने बाद में उसे माफ कर दिया है, तो वह तलाक का आधार नहीं बन सकती।

क्रूरता का आरोप साबित करने में असफल रहा पति
मामले में पति ने अपनी पत्नी पर झूठे आरोप लगाते हुए क्रूरता का हवाला देकर तलाक की मांग की थी, लेकिन कोर्ट में उसके दावों के समर्थन में कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किए गए। हाईकोर्ट ने कहा कि महज आरोप लगाने से क्रूरता सिद्ध नहीं होती।
धारा 23(1)(b) के प्रावधान लागू: माफी के बाद क्रूरता नहीं मानी जाएगी
डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा कि हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 23(1)(b) के अनुसार यदि पति या पत्नी किसी कथित क्रूरता को माफ कर दे, तो वह कानूनी रूप से तलाक का आधार नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने माना कि पति ने स्वयं स्वीकार किया है कि यदि किसी घटना का दावा किया भी गया, तो उसे उसने बाद में क्षमा कर दिया था।
फैमिली कोर्ट का निर्णय बरकरार, अपील खारिज
फैमिली कोर्ट पहले ही तलाक याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर चुका था। हाईकोर्ट ने इस निर्णय को सही ठहराया और पति की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि बिना साक्ष्य के लगाए गए आरोप न्यायालय में मान्य नहीं होते।
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