
बिहार में लाखों मतदाता खो सकते हैं वोट का अधिकार, ADR ने सुप्रीम कोर्ट में उठाया मुद्दा
जुलाई 07, 2025
चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ आवाज उठाई है। एडीआर का कहना है कि चुनाव आयोग का 24 जून 2025 का आदेश मनमाना है और इससे बिहार में लाखों मतदाताओं, खासकर हाशिए पर रहने वाले समुदायों जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, मुस्लिम और प्रवासी मजदूरों के वोट देने का अधिकार छिन सकता है। याचिका में कहा गया है कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 का उल्लंघन करता है।
कठिन दस्तावेजीकरण की शर्तें
एडीआर ने अपनी याचिका में बताया कि एसआईआर आदेश के तहत मतदाताओं को अपनी और अपने माता-पिता की नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज जमा करने होंगे। बिहार जैसे राज्य में, जहां गरीबी और पलायन की दर अधिक है, लाखों लोगों के पास ऐसे दस्तावेज नहीं हैं। अनुमान के मुताबिक, इस प्रक्रिया से लगभग तीन करोड़ मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। याचिका में कहा गया है कि आधार और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जा रहे, जिससे स्थिति और जटिल हो रही है।
समयसीमा और प्रक्रिया पर सवाल
एडीआर ने चुनाव आयोग की समयसीमा को अव्यवहारिक बताया है। याचिका में कहा गया है कि इतने कम समय में लाखों मतदाताओं के लिए आवश्यक दस्तावेज जमा करना असंभव है। इसके अलावा, हाल ही में 29 अक्टूबर 2024 से 6 जनवरी 2025 तक विशेष सारांश पुनरीक्षण (एसएसआर) पूरा किया गया था, जिसने पलायन और अन्य कारणों से अयोग्य मतदाताओं की समस्या को संबोधित किया था। ऐसे में, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एसआईआर की आवश्यकता पर सवाल उठ रहे हैं।
लोकतंत्र पर खतरा
याचिका में चेतावनी दी गई है कि यदि इस आदेश को रद्द नहीं किया गया, तो यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को बाधित कर सकता है, जो संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। एडीआर ने कहा कि यह प्रक्रिया बिना उचित प्रक्रिया के लाखों मतदाताओं को उनके प्रतिनिधियों को चुनने के अधिकार से वंचित कर सकती है। विपक्षी दलों, जैसे कांग्रेस और अन्य इंडिया ब्लॉक पार्टियों ने भी इसे ‘वोटबंदी’ करार देते हुए इसकी मंशा और समय पर सवाल उठाए हैं।
अन्य संगठनों ने भी उठाई आवाज
एडीआर के अलावा, तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इन याचिकाओं में कहा गया है कि यह प्रक्रिया असंवैधानिक है और बिहार में नवंबर 2025 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।
चुनाव आयोग का जवाब
चुनाव आयोग ने कहा है कि यह प्रक्रिया बिहार में तेजी से शहरीकरण, पलायन, युवा मतदाताओं की संख्या में वृद्धि और अवैध प्रवासियों के नाम हटाने के लिए जरूरी है। आयोग ने हाल ही में नियमों में ढील दी है, जिसमें मतदाताओं को दस्तावेज बाद में जमा करने की अनुमति दी गई है। हालांकि, विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह कदम पर्याप्त नहीं है और इससे लोकतंत्र पर खतरा बना रहेगा।
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