
भारतीय संविधान का 42वां संशोधन: ‘लघु संविधान’ की कहानी
06 जुलाई 2025
प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्दों का समावेश
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ (पंथनिरपेक्ष) और ‘सोशलिस्ट’ (समाजवादी) शब्दों को शामिल करने वाला 42वां संशोधन अधिनियम, 1976, भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय है। इस संशोधन को ‘लघु संविधान’ के रूप में जाना जाता है, क्योंकि इसने संविधान में व्यापक बदलाव किए। यह संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में आपातकाल (1975-1977) के दौरान लागू किया गया था।
आपातकाल के दौरान संशोधन की पृष्ठभूमि
42वां संशोधन उस समय लाया गया जब देश आपातकाल की स्थिति में था। इस संशोधन ने न केवल प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘पंथनिरपेक्ष’, और ‘अखंडता’ शब्द जोड़े, बल्कि संविधान के कई अन्य हिस्सों में भी बड़े बदलाव किए। इसका उद्देश्य सरकार की शक्तियों को बढ़ाना और सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की संवैधानिक समीक्षा की शक्ति को सीमित करना था। इस संशोधन को स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के आधार पर लागू किया गया था।
प्रस्तावना में नए शब्दों का महत्व
‘सेक्युलर’ शब्द जोड़ने से भारत को सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करने वाला राष्ट्र घोषित किया गया, जो किसी भी धर्म को बढ़ावा या भेदभाव नहीं करता। वहीं, ‘सोशलिस्ट’ शब्द ने सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देने की सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाया। इन शब्दों को जोड़ने का निर्णय बिना व्यापक सार्वजनिक चर्चा के लिया गया, जिसके कारण यह संशोधन विवादों में रहा।
संशोधन के अन्य प्रमुख प्रावधान
42वें संशोधन ने प्रस्तावना के अलावा कई अन्य बदलाव किए। इसमें मौलिक कर्तव्यों को भाग IVA (अनुच्छेद 51A) के तहत जोड़ा गया, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष किया गया, और राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य किया गया। साथ ही, संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाकर केवल विधिक अधिकार बनाया गया।
विवाद और आलोचनाएं
इस संशोधन को ‘लघु संविधान’ कहा गया, लेकिन इसे ‘इंदिरा का संविधान’ भी करार दिया गया, क्योंकि इसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से जोड़ा गया। कई आलोचकों का मानना था कि यह संशोधन आपातकाल के दौरान सरकार की शक्तियों को अनुचित रूप से बढ़ाने का प्रयास था। सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति को सीमित करने के प्रावधानों को बाद में 44वें संशोधन (1978) द्वारा संशोधित किया गया।
वर्तमान में विवाद
हाल के वर्षों में, प्रस्तावना से ‘सेक्युलर’ और ‘सोशलिस्ट’ शब्दों को हटाने की मांग कुछ राजनीतिक समूहों द्वारा उठाई गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि इन शब्दों को हटाने पर विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि ये मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इन शब्दों को प्रस्तावना में बनाए रखने को उचित ठहराया। इस मुद्दे पर संसद में दो-तिहाई बहुमत के बिना बदलाव संभव नहीं है।
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