
बेंगलुरु कोर्ट ने पूर्व ED अधिकारी को रिश्वतखोरी में सुनाई 3 साल की सजा, 5.5 लाख का जुर्माना
बेंगलुरु, 29 जुलाई 2025:
बेंगलुरु की एक विशेष CBI अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के पूर्व अधिकारी ललित बज़ाद को रिश्वतखोरी के मामले में दोषी ठहराते हुए तीन साल की साधारण कारावास की सजा और 5.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। यह मामला चीनी ऋण ऐप्स से संबंधित एक जांच के दौरान मुंबई की एक वित्तीय फर्म से रिश्वत मांगने और स्वीकार करने से जुड़ा है।
रिश्वतखोरी का गंभीर आरोप
ललित बज़ाद, जो चेन्नई के केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर और केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग से प्रतिनियुक्ति पर बेंगलुरु में EDमें कार्यरत थे, पर आरोप था कि उन्होंने मेसर्स अपोलो फिनवेस्ट के प्रबंध निदेशक और CEO मिखिल इन्नानी से 50 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी। बज़ाद ने धमकी दी थी कि यदि रिश्वत नहीं दी गई तो वह फर्म के खिलाफ मामला दर्ज करेंगे, कंपनी के बैंक खातों को फ्रीज करेंगे और व्यवसाय को 10 साल तक कानूनी पचड़ों में फंसाकर बर्बाद कर देंगे। अंततः, 9 फरवरी 2021 को जेपी नगर के एक पब में 5 लाख रुपये की रिश्वत स्वीकार की गई, जिसे सीबीआई ने सीसीटीवी फुटेज के साथ साबित किया।
कोर्ट का फैसला
अतिरिक्त शहर सिविल एवं सत्र न्यायाधीश और सीबीआई मामलों के विशेष न्यायाधीश मंजूनाथ संग्रेशी ने अपने फैसले में कहा कि बज़ाद ने अपनी आधिकारिक स्थिति का दुरुपयोग करते हुए मिखिल इन्नानी को डराया और 5 लाख रुपये की रिश्वत हासिल की। कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 के तहत 3 साल की सजा और 5 लाख रुपये का जुर्माना, साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 384 (जबरन वसूली) के तहत 1 साल की सजा और 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया। दोनों सजाएँ एक साथ चलेंगी।

अभियोजन पक्ष के सबूत
अभियोजन पक्ष ने साबित किया कि बज़ाद ने 28 और 29 जनवरी 2021 को इन्नानी से मुलाकात के दौरान रिश्वत की मांग की थी। कोर्ट ने माना कि भले ही बज़ाद को जांच का अधिकार नहीं था, फिर भी उन्होंने इन्नानी को कंपनी के खातों को फ्रीज करने और व्यवसाय को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी। सीबीआई ने पब के सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयानों के आधार पर ठोस सबूत पेश किए, जिससे बज़ाद की दोषसिद्धि हुई।
कानूनी दलीलों का खंडन
बज़ाद ने दावा किया कि अभियोजन पक्ष ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत जांच की पूर्व अनुमति नहीं ली थी और एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई। हालांकि, कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने उचित संदेह से परे रिश्वत की मांग और स्वीकार करने को साबित कर दिया। कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के तहत यह धारणा भी लागू की कि लोक सेवक द्वारा रिश्वत स्वीकार करना गैरकानूनी माना जाएगा, जब तक कि वह इसका खंडन न कर दे। बज़ाद इस धारणा का खंडन करने में असफल रहे।
जांच और सजा का महत्व
यह मामला जनवरी 2021 में दर्ज एक ईसीआईआर (प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट) से शुरू हुआ, जो चीनी ऋण ऐप्स से जुड़े उत्पीड़न की जांच से संबंधित था। बज़ाद उस समय उप निदेशक मनोज मित्तल की सहायता कर रहे थे। सीबीआई ने दिसंबर 2021 में बज़ाद के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। कोर्ट ने इस सजा को जांच एजेंसियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा संदेश माना है, खासकर जब ऐसी एजेंसियों पर जनता का भरोसा टिका होता है।
सार्वजनिक विश्वास और जवाबदेही
कानूनी विशेषज्ञों ने इस सजा को महत्वपूर्ण बताया है, क्योंकि यह जांच एजेंसियों में जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है। कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि भ्रष्टाचार-संभावित विभागों में आंतरिक निगरानी और स्वतंत्र निरीक्षण को और सशक्त करने की जरूरत है। यह फैसला भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति को दर्शाता है।
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