
अमेरिकी कॉपर टैरिफ ने कीमतों में उछाल लाया, आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा पर सवाल उठे
10 जुलाई 2025
परिचय: ट्रम्प के टैरिफ का वैश्विक असर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कॉपर आयात पर 50% टैरिफ लगाने की घोषणा की है, जिसके बाद न्यूयॉर्क में कॉपर की कीमतों में रिकॉर्ड 17% की वृद्धि देखी गई। यह कदम वैश्विक धातु बाजारों में आपूर्ति श्रृंखला में बड़े बदलाव लाने की संभावना रखता है। इससे न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था, बल्कि भारत जैसे देशों में भी कॉपर की कीमतों और उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। यह स्कीम विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), नवीकरणीय ऊर्जा, और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में कॉपर की बढ़ती मांग को प्रभावित करेगी।
टैरिफ की पृष्ठभूमि: राष्ट्रीय सुरक्षा जांच
फरवरी 2025 में, ट्रम्प ने व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत कॉपर आपूर्ति श्रृंखला पर राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे की जांच का आदेश दिया। यह जांच कॉपर आयात पर निर्भरता, विदेशी आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका, और घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की संभावनाओं पर केंद्रित थी। अमेरिका अपनी कॉपर खपत का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है, जिसमें चिली (38%), कनाडा (28%), और मैक्सिको (8%) प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं। ट्रम्प का दावा है कि यह टैरिफ घरेलू खनन को बढ़ावा देगा, लेकिन निर्माताओं का कहना है कि इससे लागत बढ़ेगी और वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होगी।
कीमतों में उछाल: बाजार की प्रतिक्रिया
ट्रम्प की टैरिफ घोषणा के बाद, न्यूयॉर्क के कॉमेक्स पर कॉपर वायदा कीमतें एक दिन में 17% बढ़कर $5.8955 प्रति पाउंड तक पहुंच गईं, जो 30 साल में सबसे बड़ा एकदिवसीय उछाल है। लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) की तुलना में न्यूयॉर्क की कीमतें 24% प्रीमियम पर रहीं। अमेरिकी निर्माताओं ने टैरिफ लागू होने से पहले कॉपर का स्टॉक जमा करना शुरू कर दिया, जिससे कॉमेक्स स्टॉक में वृद्धि हुई, जबकि LME और शंघाई स्टॉक में कमी आई। भारत में, LME कीमतों में गिरावट के कारण हिंदाल्को, वेदांता, और हिंद कॉपर जैसी कंपनियों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव: वैश्विक बदलाव
टैरिफ के कारण कॉपर की भौतिक आपूर्ति श्रृंखला में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। व्यापारी अमेरिका में कॉपर की शिपमेंट बढ़ा रहे हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति में कमी आ रही है। मॉर्गन स्टैनली के अनुसार, मार्च के अंत से अमेरिकी आयात साप्ताहिक 40,000 टन तक पहुंच गया, जो पहले 14,000 टन था। इससे चीन और अन्य बाजारों में कॉपर की कमी हो सकती है, जिससे वहां कीमतें बढ़ सकती हैं। भारत जैसे देशों में, जहां कॉपर आयात पर निर्भरता अधिक है, विनिर्माण लागत बढ़ने की आशंका है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में।
ऊर्जा क्षेत्र पर असर: नवीकरणीय ऊर्जा की चुनौतियां
कॉपर को “इलेक्ट्रिफिकेशन का खनिज” कहा जाता है, क्योंकि यह इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर पैनल, पवन टरबाइन, और डेटा सेंटर्स में महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं से कॉपर की मांग दोगुनी हो सकती है। अमेरिकी टैरिफ से कॉपर की कीमतें बढ़ने से नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है, जिससे अमेरिका और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संक्रमण में देरी हो सकती है। भारत में, EV और सौर ऊर्जा क्षेत्र की वृद्धि पर भी इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि कॉपर की बढ़ती लागत उत्पादन को महंगा करेगी।
आर्थिक प्रभाव: मुद्रास्फीति और उपभोक्ता लागत
टैरिफ से अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति बढ़ने की आशंका है। येल बजट लैब के अनुमान के अनुसार, 2025 के टैरिफ से अमेरिकी उपभोक्ता कीमतों में 2.3% की वृद्धि होगी, जिसका औसतन प्रति परिवार $3,800 का अतिरिक्त खर्च होगा। कॉपर की ऊंची कीमतें निर्माण, ऑटोमोबाइल, और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में लागत बढ़ाएंगी। भारत में, कॉपर की बढ़ती कीमतें उपभोक्ता वस्तुओं, जैसे वायरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स, को महंगा कर सकती हैं, जिससे मध्यम वर्ग पर बोझ बढ़ेगा।
निष्कर्ष: अनिश्चितता के बीच अवसर
अमेरिकी कॉपर टैरिफ ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है, जिससे कीमतों में उछाल, आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव, और ऊर्जा क्षेत्र में चुनौतियां सामने आई हैं। जबकि अमेरिका घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है, भारत जैसे देशों को कॉपर की बढ़ती लागत और आपूर्ति की कमी से निपटना होगा। निवेशकों के लिए, कॉपर खनन कंपनियों और ETF में अवसर हो सकते हैं, लेकिन मुद्रास्फीति और आर्थिक अनिश्चितता से सावधान रहना जरूरी है। भारत को अपनी कॉपर रीसाइक्लिंग क्षमता और घरेलू खनन को बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए ताकि वैश्विक अस्थिरता का प्रभाव कम हो।
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