
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला: पुजारी मंदिर की संपत्ति का केवल प्रबंधक, मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पुजारी केवल मंदिर की संपत्ति का प्रबंधन करने वाला एक “अनुदानकर्ता” है और उसे मंदिर की भूमि पर मालिकाना हक का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु ने कहा कि पुजारी की भूमिका केवल एक प्रबंधक की है और यदि वह पूजा-अर्चना जैसे अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहता है, तो उसका अनुदान वापस लिया जा सकता है।
पुजारी का मालिकाना हक नहीं
न्यायमूर्ति गुरु ने अपने फैसले में कहा, “कानून में यह स्पष्ट है कि पुजारी किरायेदार वंशानुगत नहीं है। वह केवल देवता की संपत्ति का प्रबंधन करने के लिए नियुक्त अनुदानकर्ता है। यदि पुजारी अपने कर्तव्यों में विफल रहते है, तो यह अनुदान वापस लिया जा सकता है। पुजारी को उस भूमि पर कोई मालिकाना हक नहीं है, और उसकी स्थिति केवल एक प्रबंधक की है। यदि पुजारी मंदिर की संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा करता है, तो यह कुप्रबंधन का कार्य है, और वह न तो कब्जे में रहने के योग्य है और न ही पुजारी के रूप में बने रहने के हकदार है।”
याचिका का आधार
मामला श्री विंध्यवासिनी मां बिलाईमाता पुजारी परिषद समिति द्वारा दायर याचिका से संबंधित है, जिसमें समिति ने विंध्यवासिनी मंदिर ट्रस्ट समिति में अपना नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने के लिए तहसीलदार के समक्ष आवेदन दिया था। तहसीलदार ने समिति के पक्ष में आदेश दिया, लेकिन उप प्रभागीय अधिकारी ने अपील पर इस आदेश को खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता की अपील को अतिरिक्त आयुक्त, रायपुर और राजस्व मंडल, बिलासपुर ने भी खारिज कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की।

याचिकाकर्ता का तर्क
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि तहसीलदार का प्रारंभिक आदेश उचित था, और अपीलीय प्राधिकारियों ने न तो मामले के तथ्यों का उचित मूल्यांकन किया और न ही 1989 के सिविल न्यायाधीश वर्ग-II, धमतरी के आदेश पर विचार किया, जिसमें कहा गया था कि मंदिर की संपत्ति किसी व्यक्तिगत पुजारी या उनके पूर्वजों की नहीं है।
प्रतिवादी का जवाब
प्रतिवादी (विंध्यवासिनी मंदिर ट्रस्ट समिति) ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को विवादित आदेश को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि वह राजस्व मंडल के समक्ष पक्षकार नहीं था। प्रतिवादी ने यह भी दावा किया कि याचिका में विसंगतियां हैं, क्योंकि याचिकाकर्ता ने एक अलग आदेश का उल्लेख किया, जो ट्रस्ट के नाम पर राजस्व रिकॉर्ड में सुधार से संबंधित था। इसके अलावा, याचिका में याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व मुरली मनोहर शर्मा द्वारा किया गया, जबकि पहले मामले में power of attorney रमेश तिवारी थे।
हाईकोर्ट का निर्णय
उच्च न्यायालय ने प्रतिवादी के तर्कों को स्वीकार करते हुए याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के पास विवादित आदेश को चुनौती देने का कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि वह संबंधित कार्यवाही में पक्षकार नहीं था। इसके साथ ही, कोर्ट ने पुजारी की भूमिका और अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जो मंदिर संपत्ति के प्रबंधन के मामलों में एक मिसाल कायम करती है।
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