
राजस्व प्रकरण में High Court का बड़ा फैसला: धारा 170(ख) के गलत इस्तेमाल पर रोक
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण राजस्व विवाद में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अनुसूचित जनजाति (एसटी) भूमि हस्तांतरण से जुड़े कानून की व्याख्या को स्पष्ट कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता, 1959 की धारा 170(ख) का प्रयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जा सकता है, जहां यह विधिवत सिद्ध हो कि किसी अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति ने अपनी भूमि का हस्तांतरण गैर-आदिवासी के पक्ष में किया हो।
धारा 170(ख) के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट सख्त
जस्टिस बीडी गुरु ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि यदि भूमि हस्तांतरण का मूल तथ्य ही सिद्ध नहीं हो पाता, तो धारा 170(ख) के तहत की गई पूरी कार्यवाही क्षेत्राधिकार से बाहर मानी जाएगी। मौजूदा मामले में यही स्थिति सामने आई, जिसके चलते हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय न्यायालय के आदेश को कानून का गंभीर उल्लंघन करार देते हुए निरस्त कर दिया।

ट्रायल कोर्ट का फैसला सही, अपील स्वीकार
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ता की अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस प्रमाण के केवल अनुमान के आधार पर किसी भूमि सौदे को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
अनुसूचित जनजाति का दर्जा क्षेत्र-विशिष्ट
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा क्षेत्र-विशिष्ट होता है और इसका निर्धारण केवल भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति के आदेश से ही किया जा सकता है। किसी भी न्यायालय को अनुसूचित जनजातियों की अधिसूचित सूची में जोड़-घटाव या संशोधन करने का अधिकार नहीं है।
क्या है पूरा मामला
मामले की शुरुआत एक भूमि विवाद से हुई थी। याचिकाकर्ता ने सिविल कोर्ट में स्थायी निषेधाज्ञा और वैकल्पिक रूप से भूमि का कब्जा दिलाने के लिए मुकदमा दायर किया था। याचिकाकर्ता के अनुसार, विवादित भूमि 11 मार्च 1977 से पहले राजस्व रिकॉर्ड में सत्राजित सिंह के वंशज अशोक कुमार सिंह और मनहरन सिंह के नाम दर्ज थी।
पंजीकृत विक्रय विलेख से हुई थी खरीद
विधिवत सत्यापन के बाद याचिकाकर्ता ने 11 मार्च 1977 को पंजीकृत विक्रय विलेख के जरिए मात्र 1000 रुपये में उक्त भूमि खरीदी। इसके बाद 28 मई 1977 को भूमि का नामांतरण याचिकाकर्ता के पक्ष में कर दिया गया। तब से याचिकाकर्ता लगातार भूमि पर काबिज रहा और खेती करता रहा।
2004 में उठा विवाद
मामला शांतिपूर्वक चल रहा था, लेकिन 22 सितंबर 2004 को प्रतिवादी गुनाराम, गजाराम और लच्छाराम ने याचिकाकर्ता को धमकाया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने राजस्व अभिलेखों से याचिकाकर्ता का नाम हटाकर अपना नाम दर्ज करा लिया है और भूमि का कब्जा सौंपने का दबाव बनाया।
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