March 4, 2026
Bilaspur: मुस्लिम संपत्ति वसीयत पर High Court का बड़ा फैसला, लोअर कोर्ट का आदेश निरस्त

Bilaspur: मुस्लिम संपत्ति वसीयत पर High Court का बड़ा फैसला, लोअर कोर्ट का आदेश निरस्त

Feb 10, 2026

बिना वारिसों की सहमति एक-तिहाई से अधिक संपत्ति वसीयत नहीं कर सकता मुस्लिम व्यक्ति
बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम संपत्ति कानून को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों के आदेश को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा वसीयत के जरिए किसी को नहीं दे सकता, जब तक कि उसके अन्य वैध वारिस अपनी सहमति न दें। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून में वारिसों के अधिकारों की सुरक्षा एक मूल सिद्धांत है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

कोरबा जिले से जुड़ा है मामला
यह फैसला कोरबा जिले से जुड़े एक मामले में आया है, जहां एक विधवा को उसके पति की संपत्ति में हिस्सेदारी देने से निचली अदालतों ने इनकार कर दिया था। इस फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी

विधवा ने हाईकोर्ट में लगाई गुहार
64 वर्षीय जैबुननिशा ने अपने पति अब्दुल सत्तार लोधिया की संपत्ति पर अधिकार को लेकर हाईकोर्ट का रुख किया था। उनके पति का वर्ष 2004 में निधन हो गया था। इसके बाद उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने एक वसीयत पेश की, जिसमें दावा किया गया कि पूरी जायदाद उसी को मिलेगी। सिकंदर ने खुद को दिवंगत का “पालक बेटा” बताया था।

वसीयत को बताया गया फर्जी
जैबुननिशा ने अदालत में दलील दी कि प्रस्तुत की गई वसीयत फर्जी है और यह उनकी सहमति के बिना तैयार की गई थी। उन्होंने पहले निचली अदालतों में मुकदमा दायर किया, लेकिन वर्ष 2015 और 2016 में दोनों अदालतों ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

हाईकोर्ट ने निचली अदालतों की गलती मानी
इसके बाद जैबुननिशा ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस बी.डी. गुरु की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालतों के आदेशों को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने माना कि निचली अदालतें विधवा के वैध कानूनी अधिकारों की रक्षा करने में असफल रही हैं।

मुस्लिम लॉ में वसीयत की स्पष्ट सीमा
हाईकोर्ट ने मुस्लिम लॉ के सेक्शन 117 और 118 का हवाला देते हुए कहा कि मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत के जरिए दे सकता है। यदि इससे अधिक संपत्ति वसीयत की जाती है या किसी वारिस को दी जाती है, तो इसके लिए सभी वैध वारिसों की सहमति आवश्यक है। कोर्ट ने इस फैसले को वारिसों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण बताया।

 

 

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