
‘जजों को डराना बंद करे सिस्टम’, बर्खास्त जज की बहाली के साथ Supreme Court का बड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के न्यायाधीशों की स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें पूर्ण बैक वेजेस और लाभों के साथ बहाल करने का आदेश दिया। साथ ही, न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ झूठी और निराधार शिकायतों पर कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी कि ऐसे मामलों में अवमानना की कार्रवाई सहित सख्त कदम उठाए जाने चाहिए।
बर्खास्त न्यायिक अधिकारी की बहाली
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन शामिल थे, ने मध्य प्रदेश के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश निर्भय सिंह सुलिया की याचिका पर सुनवाई की। सुलिया को 2015 में आबकारी अधिनियम के मामलों में जमानत देते समय कथित रूप से दोहरे मानक अपनाने और भ्रष्टाचार के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।

कोर्ट ने पाया कि बर्खास्तगी के लिए उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और आरोपों में कोई ठोस सबूत नहीं थे। पीठ ने कहा कि महज निर्णय में त्रुटि या गलत विवेक का प्रयोग अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार नहीं हो सकता। अधिकारी को 27 वर्षों की बेदाग सेवा के बाद बिना पर्याप्त जांच के हटाना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने बर्खास्तगी के सभी आदेश रद्द करते हुए उन्हें 6 प्रतिशत ब्याज सहित पूर्ण वेतन और लाभ देने का निर्देश दिया।

जजों पर डर का माहौल: सुप्रीम कोर्ट की चिंता
पीठ ने निचली अदालतों के न्यायाधीशों के सामने आने वाली चुनौतियों पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ तुच्छ और बेबुनियाद आरोप लगाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने डर का माहौल पैदा कर दिया है। इससे ट्रायल कोर्ट के जज जमानत देने में हिचकिचाते हैं, जिससे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर जमानत याचिकाओं का बोझ बढ़ जाता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक निडर न्यायाधीश स्वतंत्र न्यायपालिका की आधारशिला है। असंतुष्ट पक्षकार या बार के कुछ शरारती तत्व अक्सर झूठी शिकायतें दाखिल कर न्यायाधीशों को धमकाने की कोशिश करते हैं। ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को सतर्क रहकर न्यायाधीशों की रक्षा करनी चाहिए।
झूठी शिकायतों पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी
पीठ ने न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ झूठी और निराधार शिकायतों पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐसी शिकायतें करता पाया जाए तो उसके खिलाफ अवमानना सहित उपयुक्त कार्यवाही की जानी चाहिए। यदि शिकायतकर्ता बार का सदस्य हो तो बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए संदर्भित किया जाए।
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