
Supreme Court ने आयकर अधिनियम और परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) से जुड़े एक अहम मामले में केरल High Court के फैसले को रद्द कर दिया
सुप्रीम कोर्ट ने आयकर अधिनियम और परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) से जुड़े एक अहम मामले में केरल हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। यह निर्णय PC Hari बनाम Shine Varghese मामले में सुनाया गया, जिसमें नकद लेनदेन से बने ऋण को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या की गई है।

क्या था केरल हाईकोर्ट का फैसला
केरल हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था कि आयकर अधिनियम, 1961 का उल्लंघन करते हुए 20,000 रुपये से अधिक नकद लेनदेन से बना ऋण, जब तक उसके लिए संतोषजनक स्पष्टीकरण न दिया जाए, तब तक धारा 138, NI Act के तहत “कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण” नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों किया हस्तक्षेप
सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने कहा कि केरल हाईकोर्ट का यह दृष्टिकोण पहले ही सुप्रीम कोर्ट की समन्वय पीठ द्वारा Sanjabij Tari बनाम Kishore Borcar मामले में गलत ठहराया जा चुका है।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि ऋण नकद में दिया गया और वह आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है, उसे NI Act की धारा 138 के तहत कानूनी रूप से अप्रवर्तनीय नहीं माना जा सकता। इस तरह का निष्कर्ष स्थापित न्यायिक दृष्टांतों के विपरीत है।
मामला फिर हाईकोर्ट को भेजा गया
सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि यह निर्णय स्थिर नहीं रह सकता। अदालत ने मामले को पुनः गुण-दोष के आधार पर विचार करने के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया है।
कानूनी दृष्टि से फैसले का महत्व
यह फैसला चेक बाउंस से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि आयकर कानून के उल्लंघन और NI Act के तहत ऋण की वैधता—दोनों को अलग-अलग कानूनी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
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