
घर के अंदर कहे जातिसूचक शब्द, Supreme Court ने SC/ST एक्ट के तहत रद्द किया मुकदमा
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि घर या निजी स्थान पर कहे गए जातिसूचक शब्द स्वतः अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी SC/ST एक्ट के दायरे में नहीं आते। अदालत ने इसी आधार पर एक लंबित मामले को रद्द कर दिया।
क्या था मामला?
पीड़ित पक्ष की शिकायत के अनुसार, आरोपी ने घर के भीतर उसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया था। इसके आधार पर उसके खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज की गई थी।
लेकिन आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर FIR को रद्द करने की मांग की।

अदालत ने क्यों रद्द किया मुकदमा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि—
- SC/ST एक्ट लागू होने के लिए अपमान या गाली सार्वजनिक स्थान या सार्वजनिक दृष्टि में होना आवश्यक है।
- यदि घटना घर जैसे बंद और निजी स्थान में हुई है, तो इसे अधिनियम के दायरे में नहीं माना जा सकता।
- इस अधिनियम का उद्देश्य सार्वजनिक रूप से किसी दलित या आदिवासी व्यक्ति को अपमानित करने या उनके खिलाफ अत्याचार को रोकना है।
अदालत की टिप्पणी
बेंच ने कहा कि —
“निजी स्थान पर बोले गए शब्दों को सार्वजनिक अपमान नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में SC/ST एक्ट के प्रावधान स्वतः लागू नहीं होते।”
मामला रद्द, सामान्य IPC लागू हो सकता है
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि—
SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई रद्द होगी। पीड़ित यदि चाहे तो IPC के सामान्य अपराध (गाली-गलौज, धमकी, मारपीट आदि) के तहत मुकदमा चला सकता है।
फैसले का व्यापक असर
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय आगे कई ऐसे मामलों पर प्रभाव डालेगा, जिनमें—
- घटना घर के अंदर हुई हो
- कोई सार्वजनिक गवाह न हो
- अपमान सार्वजनिक दृश्य में न किया गया हो
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