
सरकारी वकील का काम सिर्फ सज़ा दिलाना नहीं — Supreme Court of India ने Section 313 CrPC उल्लंघन पर सज़ा रद्द की
न्याय की रक्षा में अभियोजक की जिम्मेदारी — सज़ा नहीं, निष्पक्ष सुनवाई ज़रूरी
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि सिर्फ आरोपी को सज़ा दिलाना ही अभियोजक (सरकारी वकील) का मकसद नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष का पवित्र कर्तव्य है कि वह अदालत को निष्पक्ष सुनवाई (fair trial) सुनिश्चित करें — यानि अभियुक्त को अपने खिलाफ दायर सबूतों के आधार पर स्पष्ट जवाब देने का पूरा मौका मिले।
क्या है Section 313 — अभियुक्त को सुनने का कानूनन अधिकार
भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 अभियोजन पक्ष के दावों का सामना करने के लिए अभियुक्त को अवसर देती है। इसमें अदालत आरोपी से पूछताछ करती है — कि उन पर जो आरोप हैं, वह उन पर क्या कहता है। यह प्रक्रिया अदालत और आरोपी के बीच सीधे संवाद के रूप में होती है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सज़ा केवल साक्ष्यों और उचित सुनवाई के बाद ही दी जाए।
निष्पक्ष सुनवाई में चूक — सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा रद्द की
कैंसे मामले में — Chandan Pasi & Ors. v. State of Bihar — जहां ट्रायल अदालत और अभियोजन पक्ष ने धारा 313 के तहत पूछताछ पूरी मर्यादाओं के साथ नहीं की, सिर्फ “सामान्य व अस्पष्ट सवाल” पूछे और अभियुक्तों को असली दावे व तथ्यों का सामना नहीं करने दिया, वहाँ सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे “कार्बन कॉपी” जैसा बयान-लेखन न्याय की बुनियाद को कमजोर करता है।

अभियोजक को भी है अदालत का अधिकारी मानना — सज़ा दिलाना मात्र ज़रूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से यह कहा कि अभियोजन पक्ष को केवल राज्य का वकील मानकर काम नहीं करना चाहिए। वह अदालत का एक अधिकारी है — और उसे अदालत की मदद करनी चाहिए कि वह दोष-सिद्धि से पहले निष्पक्ष तरीके से पूरे तथ्य सामने लाए। यदि अभियोजक इस कर्तव्य की अवहेलना करता है, तो उसके कारण मुकदमा, सज़ा या सज़ा का आधार गलत हो सकता है।

न्याय व्यवस्था के लिए संदेश — दोषी हों या निर्दोष, सुनवाई निष्पक्ष होनी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि हमारे आपराधिक न्याय प्रणाली में निष्पक्ष सुनवाई (fair trial), आरोपी का हक और अभियोजन पक्ष की ज़िम्मेदारी — सब बराबर मायने रखते हैं। सिर्फ दोषी को सज़ा देना ही उद्देश्य नहीं, बल्कि न्याय को सुनिश्चित करना है। यदि प्रक्रिया में कोई कमी हुई, तो सज़ा भी न्यायपूर्ण नहीं हो सकती — इसे अदालत ने पुनः रेखांकित किया है।
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