March 3, 2026
UAPA कितना भी सख्त, अवैध हिरासत मंजूर नहीं: दो साल से जेल में बंद आरोपी को सुप्रीम कोर्ट ने दी बेल

UAPA कितना भी सख्त, अवैध हिरासत मंजूर नहीं: दो साल से जेल में बंद आरोपी को सुप्रीम कोर्ट ने दी बेल

Dec 7, 2025

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: प्रक्रियागत अधिकारों का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं

नई दिल्ली। देश में आतंकवाद-रोधी कानून UAPA की कठोरता को देखते हुए अदालतें आमतौर पर बेल देने में बेहद सावधानी बरतती हैं। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कहा कि कितना भी सख्त कानून क्यों न हो, अवैध हिरासत और प्रक्रियागत अधिकारों का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने लगभग दो साल से जेल में बंद एक आरोपी को नियमित जमानत प्रदान कर दी।

अवैध हिरासत का आरोप साबित, राज्य सरकार को फटकार

पीठ ने कहा कि आरोपी को कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप न्यायिक अभिरक्षा में लेने से पहले उससे पूछताछ की गई और एक अवधि तक पुलिस की अवैध हिरासत में रखा गया, जो संविधान के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि “कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस को किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।”

दो साल से ट्रायल में देरी, कोर्ट ने कहा—अनिश्चितकाल तक हिरासत नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि मामले का ट्रायल लगभग दो साल बाद भी आगे नहीं बढ़ पाया है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि ट्रायल में लगातार देरी आरोपी के स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करती है, और यह सुनिश्चित करना अदालत की ज़िम्मेदारी है कि कठोर कानूनों के दुरुपयोग से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अनियंत्रित अंकुश न लगे।

जमानत की शर्तें तय, आरोपी को सहयोग करने का निर्देश

कोर्ट ने आरोपी को जमानत पर रिहा करते हुए कठोर शर्तें भी निर्धारित कीं। आदेश के अनुसार आरोपी को—

  • जांच में सहयोग करना होगा
  • पासपोर्ट जमा करना होगा
  • बिना अनुमति राज्य से बाहर नहीं जाना होगा

पीठ ने स्पष्ट कहा कि कानून का सम्मान करते हुए आरोपी को किसी भी प्रकार की गैरकानूनी गतिविधि में शामिल नहीं होना चाहिए।

निर्णय का महत्व: UAPA पर न्यायिक निगरानी का मजबूत संदेश

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश उन मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा, जहाँ आरोपित लंबे समय से ट्रायल में देरी और प्रक्रियागत खामियों के कारण जेल में रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय बताता है कि कठोर कानूनों का उद्देश्य न्याय है, दमन नहीं, और संविधान नागरिकों के मूल अधिकारों की अंतिम ढाल बना रहेगा।

 

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