
Supreme Court की कड़ी चेतावनी: “आरक्षण की सीमा 50% से पार हुई तो चुनाव रोक देंगे”
आरक्षण की सीमा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि संविधान द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा को पार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि राज्यों ने इस सीमा का उल्लंघन करने की कोशिश की, तो सुप्रीम कोर्ट चुनाव प्रक्रिया पर भी रोक लगाने में संकोच नहीं करेगा।
मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कई राज्य आरक्षण की सीमा बढ़ाने के प्रयास कर रहे हैं, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि इसी तरह आरक्षण बढ़ता रहा, तो मेरिट और समान अवसर पर गंभीर असर पड़ेगा।

कई राज्यों में आरक्षण सीमा बढ़ाने की पहल से पैदा हुआ विवाद
हाल के वर्षों में कई राज्यों ने पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग और अन्य समुदायों के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांगों के चलते 50% की सीमा को पार करने वाले कानून पारित किए हैं। इन कानूनों को चुनौती दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति को गंभीर बताते हुए राज्यों को आगाह किया।
संविधान का ‘50% कैप’ क्यों महत्वपूर्ण?
सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार (मंडल केस) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि—
- 50% सीमा संविधान के समानता के अधिकार (आर्टिकल 14) को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
- इससे प्रशासनिक कार्यक्षमता और मेरिट दोनों सुरक्षित रहते हैं।
- सीमा तोड़ने से आरक्षण “अनुपातहीन” होकर व्यवस्था असंतुलित कर सकता है।
चुनाव रोकने तक की चेतावनी क्यों दी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि आरक्षण सीमा बढ़ाने वाले कानून चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं या प्रभाव में लाए जाते हैं, तो अदालत को मजबूरी में चुनाव रोकने जैसे कठोर कदम उठाने पड़ सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि सरकारें राजनीतिक लाभ के लिए आरक्षण का दुरुपयोग न करें।
राज्यों को निर्देश: कानून लागू करने से पहले केंद्र व अदालत की अनुमति जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से स्पष्ट कहा कि 50% सीमा से ऊपर का आरक्षण लागू करने से पहले उसे संवैधानिक रूप से परखना अनिवार्य है, अन्यथा ऐसे कानून स्वतः अवैध माने जाएंगे।
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