
Chhattisgarh High Court का बड़ा फैसला, गाली-गलौज और जातिगत अभद्रता मामले में तीन ग्रामीण बरी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 17 साल पुराने गाली-गलौज और जातिगत अभद्रता के मामले में स्पेशल जज एट्रोसिटी कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए तीनों ग्रामीणों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि मामले में सजा कायम रखने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं।
17 साल पुराना मामला, 2006 में हुई थी घटना
यह मामला वर्ष 2006 का है। शिकायतकर्ता लखनलाल कुरें ने 22 सितंबर 2007 को भखारा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उनका आरोप था कि 17 सितंबर 2006 को ग्राम जोरातराई में दोपहर करीब 1 बजे एक बैठक के दौरान आरोपी दानीराम, लखनलाल सेन और महेश उर्फ महेंद्र साहू ने उन्हें घेरकर मां-बहन की गालियां दीं और जातिसूचक शब्दों का उपयोग किया।

पीड़ित ने कहा कि इस घटना से वह बेहोश हो गए थे और यदि रामस्वरूप साहू ने बीच-बचाव न किया होता तो उनकी जान को खतरा हो सकता था।
आईपीसी और एससी-एसटी अधिनियम के तहत दर्ज हुआ था मामला
रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ निम्न धाराओं में अपराध दर्ज किया था—
- IPC 294 (अश्लील भाषा/गाली-गलौज)
- IPC 506 (धमकी)
- IPC 323/34 (साधारण मारपीट, समान इरादा)
- एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(10) (जातिगत अपमान)
2008 में स्पेशल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
10 नवंबर 2008 को स्पेशल जज एट्रोसिटी कोर्ट ने तीनों ग्रामीणों को दोषी मानते हुए—
- धारा 294 के तहत 500 रुपये जुर्माना (न देने पर 1 माह की जेल)
- धारा 323/34 के तहत 1000 रुपये जुर्माना (न देने पर 2 माह की जेल)
की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर दिया बरी होने का लाभ
हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य सजा को कायम रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके चलते कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए तीनों आरोपियों को पूरी तरह बरी कर दिया।
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