
संरक्षित वनों में अवैध ग्रेफाइट खनन: वन विभाग की चुप्पी पर सवाल
15 जून 2025:
बलांगीर जिले के संरक्षित वन क्षेत्रों में अवैध ग्रेफाइट खनन का खतरनाक चलन सामने आया है। खनिज की कमी वाले इस क्षेत्र में पत्थर माफिया अंधेरे की आड़ में संरक्षित वनों से ग्रेफाइट निकाल रहे हैं, जिससे पर्यावरण और प्रशासनिक चिंताएँ बढ़ रही हैं। स्थानीय वन अधिकारियों को इसकी जानकारी होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे तस्करी का धंधा फल-फूल रहा है।
किरीबाजी वन क्षेत्र बना खनन का केंद्र
देवगांव ब्लॉक के पटनागढ़ और सैंतला वन श्रृंखलाओं में किरीबाजी संरक्षित वन अवैध ग्रेफाइट खनन का मुख्य केंद्र बन गया है। माफिया ट्रैक्टरों का उपयोग कर रात के समय जंगलों से ग्रेफाइट निकालते हैं और इसे गुप्त स्थानों पर संग्रहीत कर राज्य से बाहर तस्करी करते हैं। बेलघाटी, खमगुडा, जुराबांडा, पानीपीटा, डुकर चराचारा, देशंध, बंकिआमुंडा, दब्युरी, केउमल, तुमरजोर, लांडापाथर, घाटुल डुंगुरी और भंडारबांजी जैसे गाँवों में यह गतिविधि बड़े पैमाने पर चल रही है।

संगठित तस्करी का नया रूप
पहले बंकिआमुंडा में पुखराज और क्वार्ट्ज जैसे दुर्लभ पत्थरों का संग्रह होता था, जिससे मामूली आय होती थी। लेकिन अब ग्रेफाइट का संगठित खनन और वाणिज्यिक तस्करी हो रही है। स्थानीय सड़कें, विशेष रूप से बंकिआमुंडा से कामिपाली तक, ग्रेफाइट मलबे से भरी पड़ी हैं। पत्थरों को छोटे टुकड़ों में तोड़कर बोरियों में भरकर भंडारों में छिपाया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि स्थानीय लोग इस व्यापार में शामिल हैं और उन्हें प्रति किलो 60 रुपये का भुगतान किया जाता है। कथित तौर पर कांटाबांजी का एक बिचौलिया छत्तीसगढ़ के रायपुर में शिपमेंट का समन्वय कर रहा है।
वन विभाग की निष्क्रियता पर आलोचना
स्थानीय लोगों ने वन विभाग की चुप्पी और निष्क्रियता की कड़ी आलोचना की है। एक घटना में, जब ग्रामीणों ने घाटुल तुंगु-बंकियामुंडा सड़क पर ग्रेफाइट ले जा रहे एक ट्रैक्टर को रोकने की कोशिश की, तो कोई आधिकारिक कार्रवाई नहीं हुई। इसके बजाय, मामले को अनौपचारिक रूप से सुलझा लिया गया। बार-बार शिकायतों और सबूतों के बावजूद, वन विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
जिला वन अधिकारी का बयान
जिला वन अधिकारी अजीत बिशी ने कहा, “मामले की जांच की जाएगी और अवैध रूप से खनन किए गए सभी ग्रेफाइट को जब्त कर लिया जाएगा।” हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसी घोषणाएँ पहले भी की जा चुकी हैं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
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