
Chhattisgarh : नवजात शिशु के इंक्यूबेटर पर अमानवीय पोस्टर , मां की HIV स्थिति उजागर, हाईकोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल में एक शर्मनाक घटना सामने आई है, जहां एक नवजात शिशु के इंक्यूबेटर के पास एक पोस्टर लगा दिया गया था। इस पोस्टर पर लिखा था- “बच्चे की मां HIV पॉजिटिव है”। इस घटना ने मरीजों की गोपनीयता और मानवीय गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे बेहद अमानवीय करार दिया है। आइए, इस घटना के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से नजर डालते हैं।

घटना का विवरण
रायपुर के डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल, जो राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है, में हाल ही में एक HIV पॉजिटिव महिला ने एक बच्चे को जन्म दिया। अस्पताल के स्त्री रोग वार्ड में भर्ती इस महिला के नवजात शिशु को नर्सरी वार्ड में रखा गया था। यहां स्टाफ ने इंक्यूबेटर के पास एक पोस्टर चिपका दिया, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा था कि बच्चे की मां HIV पॉजिटिव है। यह पोस्टर न केवल मां की गोपनीयता का उल्लंघन था, बल्कि वार्ड में आने-जाने वाले अन्य लोगों के लिए भी इसे सार्वजनिक कर रहा था। [19]
यह कदम HIV/AIDS जैसे संवेदनशील मामलों में रोगी की पहचान सुरक्षित रखने के सभी नियमों का उल्लंघन करता है। अस्पताल प्रशासन की इस लापरवाही ने मां और बच्चे को सामाजिक कलंक के खतरे में डाल दिया।
पिता की भावुक प्रतिक्रिया
जब नवजात शिशु के पिता अस्पताल पहुंचे और अपने बच्चे को देखने गए, तो उन्होंने इस पोस्टर को देखा। यह देखकर वे बेहद भावुक हो गए और रो पड़े। पिता का कहना था कि यह न केवल उनकी पत्नी की गरिमा का अपमान है, बल्कि पूरे परिवार को समाज में अपमानित करने जैसा है। इस घटना की खबर मीडिया में आने के बाद यह मामला और ज्यादा सुर्खियों में आ गया। पिता की यह प्रतिक्रिया अस्पताल की असंवेदनशीलता को उजागर करती है, जहां मरीजों के साथ मानवीय व्यवहार की बजाय ऐसी गलतियां हो रही हैं। [19]

हाईकोर्ट का स्वत: संज्ञान और सुनवाई
मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लिया और इसे जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज किया। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान अस्पताल के इस कृत्य पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि यह अत्यंत अमानवीय, असंवेदनशील और निंदनीय है। इससे मां-बच्चे की पहचान उजागर हुई, जो उन्हें भविष्य में सामाजिक भेदभाव और कलंक का शिकार बना सकता है। [19]
कोर्ट ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और गरिमा के साथ जीने के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन बताया। हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि राज्य के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान से इस तरह की उम्मीद नहीं की जाती।
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