
भ्रष्टाचार का काला अध्याय: 7 IAS और एक मंत्री पर CBI का शिकंजा
शुरुआत: एक गंभीर खुलासा
दिनांक 2 अक्टूबर 2025 को एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है, जो देश के प्रशासनिक तंत्र पर सवाल उठाती है। रायपुर से प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक बड़े भ्रष्टाचार के मामले में 7 वरिष्ठ IAS अधिकारियों और एक मंत्री को कथित तौर पर शामिल पाया गया है। यह मामला 15 साल पुराने एक घोटाले से जुड़ा है, जिसमें सरकारी विभागों और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के बीच कथित मिलीभगत का पर्दाफाश हुआ है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस मामले में गहन जांच शुरू कर दी है, जो आने वाले दिनों में कई बड़े खुलासों की उम्मीद जगाती है।

घटना की पृष्ठभूमि
यह मामला तब सामने आया जब एक शिकायत के बाद CBI ने 16 नवंबर 2004 को शुरूआती जांच शुरू की थी। इस घोटाले का केंद्र बिंदु एक सरकारी विभाग और एक NGO के बीच कथित अनुचित संबंधों पर आधारित है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस NGO को सरकारी फंडिंग दी गई थी, जिसका उपयोग राज्य संसाधन केंद्र (SRC) और शारीरिक पुनर्वास केंद्र (PRRC) जैसे कथित सामाजिक कल्याण परियोजनाओं के लिए किया जाना था। हालांकि, जांच में पता चला कि ये फंड्स गलत तरीके से इस्तेमाल किए गए और कई अधिकारियों ने इस प्रक्रिया में व्यक्तिगत लाभ उठाया।
मुख्य अभियुक्त
- देवव्रत भगत: रायपुर के एक वरिष्ठ अधिकारी, जिन्हें इस मामले में प्रारंभिक तौर पर जिम्मेदार माना जा रहा है।
- रंजना सिंह: एक IAS अधिकारी, जो इस योजना के प्रबंधन में शामिल थीं।
- विवेक मोहन: एक अन्य IAS अधिकारी, जिनका नाम फंड के आवंटन में सामने आया।
- राजेश राठौर: एक और वरिष्ठ IAS, जिन्हें कथित तौर पर फर्जीवाड़े में शामिल पाया गया।
- अन्य 3 IAS और एक मंत्री: अभी तक इनके नाम पूरी तरह से उजागर नहीं हुए हैं, लेकिन इनकी संलिप्तता की जांच चल रही है।

घोटाले की गहराई
जांच के प्रारंभिक नतीजों से पता चला है कि इस NGO ने सरकारी फंड का दुरुपयोग करते हुए नकली परियोजनाओं और फर्जी दस्तावेजों के जरिए करोड़ों रुपये हड़प लिए। इनमें से कुछ फंड्स व्यक्तिगत खातों में स्थानांतरित किए गए, जबकि अन्य को विदेशी खातों में भेजा गया। इस मामले में 15 साल तक चली जांच के बाद CBI ने ठोस सबूत जुटाए हैं, जिसमें बैंक लेनदेन के रिकॉर्ड और फर्जी हस्ताक्षर शामिल हैं।
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