
Bilaspur 17 साल पुराने एट्रोसिटी मामले में शिक्षिका को मिली राहत
बिलासपुर, 1 अक्टूबर 2025। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 17 साल पुराने अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के मामले में एक शिक्षिका को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। यह निर्णय न्यायमूर्ति (जज का नाम समाचार में उल्लेखित नहीं) की एकलपीठ ने सुनाया।
मामला क्या था?
साल 2008 में जिले के एक शासकीय विद्यालय में पदस्थ शिक्षिका पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने कक्षा में पढ़ाई के दौरान अनुसूचित जाति वर्ग की एक छात्रा के साथ जातिगत टिप्पणी की थी। इस घटना के आधार पर छात्रा के परिजनों ने शिक्षिका के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। शिकायत के बाद स्थानीय पुलिस ने SC/ST Act की धाराओं और भारतीय दंड संहिता (IPC) की कुछ धाराओं के तहत शिक्षिका को आरोपी बनाया था।
निचली अदालत का फैसला
मामला सेशन कोर्ट तक पहुँचा। वहाँ शिक्षिका को दोषी मानते हुए सजा सुनाई गई थी। इसके खिलाफ शिक्षिका ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट में सुनवाई
- हाईकोर्ट में मामले की विस्तृत सुनवाई हुई। अदालत ने पाया कि—
- घटना के समय कथित पीड़िता की गवाही और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान में गंभीर विरोधाभास है।
- FIR दर्ज करने में असामान्य देरी हुई, जिसका कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया।
- जातिगत टिप्पणी को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
- विद्यालय के अन्य विद्यार्थियों और स्टाफ ने भी शिक्षिका के पक्ष में बयान दिए।

कोर्ट का फैसला
अदालत ने कहा कि आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हुए और निचली अदालत ने साक्ष्यों की गलत व्याख्या की थी। इसके आधार पर हाईकोर्ट ने शिक्षिका को दोषमुक्त घोषित करते हुए सजा को रद्द कर दिया।
यह फैसला एक बार फिर दर्शाता है कि SC/ST Act जैसे सख्त कानून का दुरुपयोग होने पर न्यायालय सतर्कता बरतता है। अदालत ने साफ किया कि किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं, केवल आरोपों के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।
शिक्षिका की प्रतिक्रिया
फैसले के बाद शिक्षिका ने राहत की सांस लेते हुए कहा—
“मेरे जीवन के 17 साल इस मुकदमे में निकल गए। आज न्याय पाकर मुझे ऐसा लग रहा है मानो जीवन को फिर से जीने का अवसर मिला है।”
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