March 2, 2026
SC/ST एक्ट में जमानत: CJI ने खींची लक्ष्मण रेखा, High Court का फैसला पलटा

SC/ST एक्ट में जमानत: CJI ने खींची लक्ष्मण रेखा, High Court का फैसला पलटा

Sep 4, 2025

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST एक्ट) के तहत दर्ज मामलों में जमानत के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया है कि इस कानून का उद्देश्य दलितों और आदिवासियों के नागरिक अधिकारों की रक्षा करना, उन्हें अपमान और उत्पीड़न से बचाना है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए सख्त रुख अपनाया और जमानत देने के लिए सख्त शर्तें तय कीं।


SC/ST एक्ट का मकसद: अधिकारों की रक्षा
CJI की अगुवाई वाली पीठ ने अपने फैसले में कहा कि SC/ST एक्ट का मूल उद्देश्य अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को सामाजिक भेदभाव, अपमान और उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना है। पीठ ने जोर देकर कहा कि इस कानून को लागू करने में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत तभी दी जा सकती है, जब यह सुनिश्चित हो कि आरोपी द्वारा अपराध की पुनरावृत्ति की संभावना नहीं है और मामले की गंभीरता को ध्यान में रखा जाए।

हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें SC/ST एक्ट के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी को आसानी से जमानत दे दी गई थी। CJI ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को नजरअंदाज किया और कानून के प्रावधानों की अनदेखी की। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि इस तरह के मामलों में जमानत देते समय निचली अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि पीड़ितों के न्याय के अधिकार को ठेस न पहुंचे

जमानत के लिए सख्त शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जमानत के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मामलों में जमानत तभी दी जा सकती है, जब:
यह स्पष्ट हो कि प्रथम दृष्टया मामला गलत या मनगढ़ंत नहीं है।

आरोपी के खिलाफ सबूतों की प्रबलता को ध्यान में रखा जाए।

जमानत देने से पीड़ित पक्ष को कोई खतरा न हो।

मामले की गंभीरता और सामाजिक प्रभाव को देखा जाए।

सामाजिक न्याय की दिशा में कदम
इस फैसले को सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। दलित और आदिवासी समुदायों के लिए यह कानून एक मजबूत ढाल के रूप में काम करता है, और सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसे और सशक्त बनाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला न केवल निचली अदालतों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्ध होगा, बल्कि समाज में समानता और न्याय को बढ़ावा देने में भी मदद करेगा।

 

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