
Bilaspur दुष्कर्म मामले में सबूतों की कमी, आरोपी को राहत”
बिलासपुर | छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने भतीजी के साथ ज्यादती के मामले में आरोपी की बाइज्जत बरी करार
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने एक गंभीर मामले में न्यायिक प्रक्रिया के तहत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाइकोर्ट ने भतीजी के साथ कथित ज्यादती के मामले में आरोपी को सबूतों के अभाव में बाइज्जत बरी कर दिया। यह मामला 20 दिसंबर 2018 को दर्ज हुआ था, जब पीड़िता ने अपने चाचा पर गंभीर आरोप लगाए थे। इस मामले में हाइकोर्ट के न्यायमूर्ति पी. समाधि और न्यायमूर्ति किशोर प्रसाद की खंडपीठ ने गहन सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।

घटना की पृष्ठभूमि
20 दिसंबर 2018 को पीड़िता ने थाने में शिकायत दर्ज की थी, जिसमें उसने बताया कि उसके माता-पिता के अलावा घर से 5 दिसंबर 2018 को चाचा ने उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। पीड़िता ने अपनी मां से इस घटना की जानकारी दी, जिसके बाद यह मामला पुलिस तक पहुंचा। पुलिस ने इस मामले में गहन जांच शुरू की और आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म) और पॉक्सो अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। जांच के दौरान पुलिस ने कई गवाहों के बयान दर्ज किए और चिकित्सीय परीक्षण भी कराया गया।
कोर्ट की सुनवाई
मामले की सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्कों को ध्यान से सुना। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि पीड़िता के बयान और चिकित्सीय रिपोर्ट के आधार पर आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। वहीं, रक्षा पक्ष ने दलील दी कि पीड़िता के बयान में कई विरोधाभास हैं और कोई ठोस सबूत पेश नहीं किए गए, जो अपराध को सिद्ध करने के लिए आवश्यक हैं। हाइकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, जिसके आधार पर आरोपी को बरी किया गया।
फैसले का महत्व
यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में सबूतों के महत्व को एक बार फिर रेखांकित करता है। हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को बिना ठोस सबूत के दोषी ठहराया जाना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। इस निर्णय से यह भी संकेत मिलता है कि गंभीर अपराधों में भी अगर साक्ष्य कमजोर हों, तो न्यायालय आरोपी को राहत दे सकता है। हालांकि, इस फैसले से पीड़िता और उसके परिवार में निराशा फैल गई है, जिन्होंने न्याय की उम्मीद लगाई थी।

सामाजिक संदर्भ
इस तरह के मामले समाज में गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। ऐसी घटनाओं में पीड़ितों को न केवल शारीरिक और मानसिक trauma से गुजरना पड़ता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में लंबे समय तक इंतजार भी करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पुलिस और न्यायिक व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सके।
👉 हमारे WhatsApp channel से जुड़ने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें👇👇
https://whatsapp.com/channel/0029VbALQC677qVNwdR5Le3V



