
BHARAT चीन और RUSSIA के साथ रणनीतिक संबंधों को मजबूत करता हुआ
अमेरिका के टैरिफ विवादों और बढ़ते आर्थिक दबाव के बीच, भारत ने अपनी विदेश नीति में पूर्व की ओर रुख करते हुए चीन और रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को नई मजबूती दी है। यह कदम भारत की आर्थिक और भू-राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

चीन के साथ कूटनीतिक पुनर्स्थापना
- हाल ही में चीन के विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद को पुनर्जीवित किया। वार्ता में भारत और चीन ने:
- लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला जैसे पारंपरिक सीमा पार व्यापार मार्गों को फिर से खोलने पर सहमति जताई,
- सीमा प्रबंधन के लिए सैनिक टहलियों के समन्वय और तनाव कम करने के उपायों पर चर्चा की,
- भारत और चीन के बीच प्रत्यक्ष विमान सेवा पुनः शुरू करने का निर्णय लिया।
चीन ने भारत के निर्यात पर लगाई गई अमेरिकी 50% टैरिफ की भी आलोचना की और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में सहयोग की बात कही। चीन ने उर्वरक, दुर्लभ पृथ्वी धातुओं और सुरंग खनन मशीनों पर लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों को भी भारत की मांग पर सौम्य किया है।
रूस के साथ ऊर्जा और व्यापार सहयोग
रूस के साथ भारत के संबंध भी पिछले वर्षों में बहुत मजबूत हुए हैं, खासकर तेल आयात में। भारत ने रूस से तेल की खरीद बढ़ाकर भारी मात्रा में डॉलर की बचत की है, जिससे रूस-भारत के बीच व्यापारिक लेनदेन 2025 के मार्च तक लगभग $69 बिलियन तक पहुंच गया।
रूस ने भारत को ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्रों जैसे आर्कटिक शेल्फ और पूर्वी सुदूर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का आश्वासन दिया है। दोनों देशों ने फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पादों और वस्त्रों के निर्यात को बढ़ाने की योजना बनाई है, जिससे व्यापार घाटे को कम किया जा सके।

पूर्व की ओर रणनीतिक रुख का महत्व
भारत की यह पूर्व की ओर रणनीति चीन, रूस जैसे ऊर्जा और आर्थिक साझेदारों के साथ रिश्तों को सुदृढ़ करने का संकेत है। यह न केवल अमेरिका की टैरिफ नीतियों के प्रतिकार के रूप में है, बल्कि भारत की सुरक्षा, ऊर्जा और आर्थिक स्थिरता की बड़ी प्राथमिकता को भी दर्शाता है।
भू-राजनीतिक स्थिति
भारत-चीन के बीच 2020 के गलवान घाटी संघर्षों के बाद रिश्तों में तनाव था, लेकिन अब दोनों देश बेहतर व्यापार और कूटनीतिक संबंधों की ओर बढ़ रहे हैं, हालांकि सीमा विवाद पूरी तरह से सुलझा नहीं है। रूस के साथ भी मुद्रा और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग जारी है, जो भारत के लिए पश्चिमी प्रतिबंधों के विरुद्ध एक विकल्प प्रदान करता है।
इस प्रकार, भारत ने चीन और रूस के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को पुनःस्थापित और सशक्त कर पश्चिम के दबाव के बीच अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखा है। यह कूटनीतिक बदलाव भारत के दीर्घकालिक आर्थिक और सुरक्षा हितों के अनुरूप है।
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