
रिश्वतखोरी केस में SECL के दो कर्मचारी बरी, High Court ने स्पेशल कोर्ट का फैसला किया रद्द
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के दो कर्मचारियों को रिश्वतखोरी के मामले में बड़ी राहत दी है। जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने सीबीआई की स्पेशल कोर्ट द्वारा सुनाई गई डेढ़ साल की सजा और जुर्माने के आदेश को रद्द करते हुए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया। यह फैसला करीब दो दशक पुराने मामले में कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण राहत लेकर आया है।

क्या था मामला?
कोरबा जिले के छुराकछार खदान में स्थित SECL के कार्मिक प्रबंधक कार्यालय में तैनात कर्मचारी नित्यानंद और उनके सहयोगी पर आरोप था कि उन्होंने एक बर्खास्त कर्मचारी से उसकी सीपीएफ राशि निकालने के एवज में रिश्वत मांगी थी। शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपियों ने पहले 10 हजार रुपये की मांग की, लेकिन उसकी असमर्थता पर राशि घटाकर 2 हजार रुपये में सौदा तय किया गया। शिकायत मिलने पर सीबीआई ने 8 नवंबर 2004 को ट्रैप कार्रवाई कर दोनों कर्मचारियों को गिरफ्तार किया और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया। जांच के बाद स्पेशल कोर्ट ने दोनों को दोषी ठहराते हुए डेढ़ साल की कैद और 3 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में दी गई चुनौती
स्पेशल कोर्ट के फैसले को दोनों कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनके अधिवक्ता संदीप दुबे ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत आवश्यक स्वीकृति प्राप्त नहीं की थी। इसके अलावा, कथित रिश्वत की राशि आरोपियों के पास से नहीं, बल्कि स्टोर रूम से बरामद हुई थी। सीबीआई अधिकारियों और शिकायतकर्ता के बयानों में भी कई विरोधाभास पाए गए, जो मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्पेशल कोर्ट ने साक्ष्यों और तथ्यों का उचित मूल्यांकन नहीं किया। गवाहों के बयानों में विरोधाभास और सबूतों की कमजोरी को देखते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दी गई दोषसिद्धि और सजा को टिकाऊ नहीं माना जा सकता। इस आधार पर जस्टिस रजनी दुबे ने दोनों कर्मचारियों को बरी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में अपील की शर्तें
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह शर्त जोड़ी कि दोनों कर्मचारियों को 25 हजार रुपये का व्यक्तिगत बांड और समान राशि का जमानतदार प्रस्तुत करना होगा। यह बंधपत्र छह माह तक प्रभावी रहेगा। साथ ही, यदि इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की जाती है, तो आरोपियों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।
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