
Jashpur जिले में आदिवासी उत्सव: लोक संस्कृति, नृत्य और खेलकूद का अनूठा संगम
जशपुर, छत्तीसगढ़। राज्य के उत्तर–पूर्वी सिरे पर बसे जशपुर जिले में इस बार आदिवासी महोत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। तीन दिनों तक चले इस अद्भुत आयोजन में हजारों स्थानीय लोगों ने पारंपरिक नृत्य, लोकगीत और खेलकूद में सक्रिय भागीदारी दर्ज की। उत्सव स्थल पर रंग-बिरंगे परिधान, लोक वाद्य यंत्रों की गूंज, और उत्साहित लोगों की भीड़ ने जिल्ले को संस्कृति और सद्भावना के रंग में रंग दिया।

उत्सव की शुरुआत और सांस्कृतिक विविधता
महोत्सव की शुरुआत पारंपरिक ‘नाचा’ नृत्य और स्वागत गीत से हुई। बोली,झाड़, सांबा, सरगुजा, कुड़ुक, उरांव जैसी जनजातियों ने अपने रंगीन परिधान और शास्त्रीय लोक वाद्य के साथ प्रस्तुति दी। हर उम्र के महिला–पुरुष मंच पर उतरे और अपने ऐतिहासिक नृत्य व लोकगीतों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। बच्चे भी लोककला के खेलों, नृत्य प्रतियोगिता और क्विज में उत्साह से भाग लेते नजर आए।
लोक खेल–कूद एवं परंपरा
महोत्सव के दौरान ‘कनहेर’, ‘पिट्ठुल’, ‘फुगड़ी’, ‘लाठी दौड़’, ‘धनुष–वाण’, ‘मटका दौड़’ जैसे पारंपरिक खेलों का आयोजन किया गया। इन खेलों में ग्रामीण व शहरी युवाओं ने पारंपरिक कौशल का प्रदर्शन किया। स्थानीय तौर पर प्रसिद्ध पारंपरिक खाने के स्टॉल भी लगाए गए, जिसमें रीवा, रोटी, सरगुजा का भजिया और महुआ का रस खास आकर्षण रहे।
प्रशासन और संस्कृति विभाग की भागीदारी
संस्कृति विभाग के अधिकारियों और जिला प्रशासन ने महोत्सव को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया। प्रशासन ने सुरक्षा से लेकर जल व्यवस्था, पंडाल सजावट और कार्यक्रम के प्रचार–प्रसार की पूरी व्यवस्था देखी। जिला कलेक्टर ने कहा, “ऐसे आयोजन सामाजिक एकता, सांस्कृतिक समृद्धि और स्थानीय पहचान को मजबूती देते हैं। अगले वर्ष और व्यापक स्तर पर कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा।”
स्थानीय लोगों और संगठनों की सराहना
ग्रामों से आए वरिष्ठ नागरिकों और जनजातीय नेताओं ने इस पहल का स्वागत किया। उनका कहना है कि महोत्सव से नई पीढ़ी को अपनी परंपरा, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत जानने–समझने का मौका मिलता है। कई स्वयंसेवी संगठनों ने भी सहयोग किया और बच्चों के लिए सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ, चित्रकला शिविर तथा खेल प्रशिक्षण रखे।
उत्सव का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
महोत्सव ने जशपुर जिले की विविधता, एकता और रचनात्मकता को देशभर में पहचान दिलाई। युवाओं और बच्चों ने वर्तमान तकनीकी युग में अपनी जड़ों से जुड़ने और सांस्कृतिक मूल्यों को अपनाने का संकल्प लिया। महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही—उन्होंने नृत्य, भोजन व हस्तशिल्प प्रदर्शनी में अग्रणी भूमिका निभाई।
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