
Supreme Court का संविधान सभा बहसों पर ऐतिहासिक निर्णय
21 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्र सरकार द्वारा संविधान सभा की बहसों को राष्ट्रपति के कार्यकाल और विधायी प्रक्रिया के लिए कानूनी आधार मानने के दावे को पूर्णतः खारिज कर दिया है।

पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला देते हुए कहा कि संविधान की व्याख्या वर्तमान संवैधानिक ढांचे और न्यायिक पूर्वनिर्धारणों के आधार पर होनी चाहिए, न कि 1946-50 की संविधान सभा की बहसों के आधार पर। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि “संविधान एक जीवंत दस्तावेज है जिसकी व्याख्या समकालीन संदर्भ में होनी चाहिए।”
इस फैसले का व्यापक प्रभाव राष्ट्रपति के विधेयकों पर निर्णय की समय-सीमा, संसदीय प्रक्रिया की व्यूह रचना, और कार्यकारी शाखा की शक्तियों की सीमा निर्धारण पड़ेगा।

न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकार भविष्य में संविधान सभा की बहसों का हवाला देकर अपनी नीतियों को उचित ठहराने की कोशिश नहीं कर सकती। इस निर्णय को संवैधानिक विशेषज्ञों द्वारा न्यायिक स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
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