
डिंडौरी में गरीबों का राशन खा रहे अमीर, लखपति-करोड़पतियों के नाम भी BPL सूची में!
शाहपुर ग्राम पंचायत में मुफ्त राशनखोरी का खुलासा, प्रशासन पर उठे सवाल
डिंडौरी। मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां लखपति और करोड़पति लोग गरीबों के लिए बने राशन कार्ड का दुरुपयोग कर मुफ्त राशन ले रहे हैं। जिले की शाहपुर ग्राम पंचायत में 819 परिवारों में से कई ऐसे हैं, जो आर्थिक रूप से संपन्न होने के बावजूद बीपीएल सूची में शामिल हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। यह मामला अब जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है।
अमीरों के पास BPL कार्ड, गरीबों का हक छीना
शाहपुर ग्राम पंचायत में रहने वाले कई परिवारों के पास आलीशान मकान, गाड़ियां और बैंक में मोटी जमा पूंजी है। इसके बावजूद, ये लोग सरकारी रिकॉर्ड में गरीब के रूप में दर्ज हैं और हर महीने मुफ्त राशन प्राप्त कर रहे हैं। आरोप है कि इन परिवारों में बड़े व्यवसायी भी शामिल हैं, जो न केवल राशन बल्कि सरकार की अन्य योजनाओं का भी लाभ ले रहे हैं। यह स्थिति गरीबों के हक को छीनने का गंभीर मामला बन गया है।

प्रशासन की लापरवाही या सिस्टम की खामी?
जिले के खाद्य अधिकारी का कहना है कि बीपीएल सूची तहसीलदार के माध्यम से सर्वे के आधार पर तैयार की जाती है, और उसी के आधार पर राशन पात्रता पर्ची जारी होती है। हालांकि, इस मामले ने सर्वे की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं, एसडीएम ने मामले की जांच करवाने और अपात्र लोगों के नाम बीपीएल सूची से हटाने का आश्वासन दिया है। लेकिन सवाल यह है कि इतने समय तक यह गड़बड़ी कैसे चलती रही?
भाजपा जिलाध्यक्ष ने की सख्त कार्रवाई की मांग
डिंडौरी जिले के भाजपा जिलाध्यक्ष चमरू सिंह नेताम ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि प्रशासन को अपात्र लोगों के नाम तत्काल बीपीएल सूची से हटाना चाहिए। उन्होंने इस गड़बड़ी को गरीबों के साथ अन्याय बताया और त्वरित कार्रवाई की मांग की।

चर्चा में डिंडौरी, उठ रहे सवाल
यह मामला न केवल शाहपुर ग्राम पंचायत बल्कि पूरे डिंडौरी जिले के प्रशासनिक सिस्टम पर सवाल उठा रहा है। गरीबों के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ अमीरों द्वारा लिया जाना सामाजिक न्याय के खिलाफ है। स्थानीय लोग इस बात से नाराज हैं कि जिम्मेदार अधिकारी इस गड़बड़ी को जानते हुए भी चुप्पी साधे रहे।
प्रशासन ने अब जांच का भरोसा दिया है, लेकिन यह देखना बाकी है कि कितनी जल्दी अपात्र लोगों के नाम बीपीएल सूची से हटाए जाते हैं और गरीबों का हक उन्हें वापस मिलता है। इस मामले ने एक बार फिर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी की जरूरत को उजागर किया है।
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